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सोमवार, मार्च 3

किसी को भी प्रभावित किया जा सकता है,केवल और केवल अपने व्यवहार से

किसी को भी प्रभावित किया जा सकता है,केवल और केवल अपने व्यवहार से 
आज बहुत दिनों के बाद एक बार फिर एक लेख लिख रहा हूँ ,कारण यह है,इसका में साक्षात् अनुभव कर चुका हूँ, अध्यात्म से लगभग ३०,३५ बर्षो से जुड़ा हुआ हूँ, मेरे गुरु जी योगदा सत्संग सोसाइटी के संथापक हैं, स्वामी प्रह्महन्स योगानंद जी,आत्मा के जो विषेश गुण हैं,प्यार,सहनशीलता इत्यादि इनका अनुभव बहुत पहेले करवा चुके हैं,और हम लोगों को यह भी अनुभव करवा चूकें है,हम वास्तव में आत्मा हैं,और परमात्मा से साक्षात्कार भी करने का तरीका भी बता चुकें हैं, मेरे लीये तो जो मेरी आत्मा को अच्छा लगता है,वोह अपना लेता हूँ, परन्तु सबसे उपयोगी बात यह है,अगर कोई दिशाहीन को दिशा दे,वोह तो ठीक है,पर सबसे उपयोगी बात यह है,अगर कोई चरित्र को हमारे सामने रक्खे ,और उससे शिक्षा मिले तो विश्व का कोई  धर्म हो कोइ पंथ हो,चारित्रिक शिक्षा से बड़ कर कोइ  नहीं,यह ऐसी मूक भाषा है,जिसका प्रभाव सब पर पड़ता है,किसी धर्मग्रंथ ,किसी गुरु  किसी पन्थ की आवश्यकता नहीं, समय की धारा ने मेरे को एक अध्यात्मिक संस्था से जोड़ दिया,जो मुझे कोई मुझे इसमें लायी थी ,उस समय उसको ज्ञात नहीं था,में योगी अमृतकथा हिंदी मेंऔर अंग्रेजी में लिखने वाले विश्वप्रसिद्ध लेखक  स्वामी योगानंद  जी का शिष्य हूँ,  इस संस्था में भी दैवी गुण जो आत्मा के स्वाभिक गुण हैं,उनको धारण करने की शिक्षा दी जाती है,क्योंकि उससे बहुत अच्छे सम्बन्ध हैं,पर जब मेने देखा उसकी वाणी में कटुता,जो कि दिल पर चोट कर जाये,अह्म जो अपने को मेरे से उच्च श्रेणी का समझे,समता का भाव ना रखे, यह समझे मेरे को उससे अच्छी प्राप्ति ना हो, और भी कुछ ऐसे लोग थे,जो मेरी बात सुनने को तय्यार ही ना हों,मझे लगने लगा  इस संस्था में ऐसे लोग हैं, तो इस संस्था से जुड़ने का क्या लाभ, में तो उस संस्था को छोड़ने की सोच चूका था,परन्तु उसी संस्था में ऐसे लोग मिले जिन्होंने मेरी बातों को सुना,मेरी जिज्ञासा को शांत किया,हाँ लाने वाली के मन मैं मेरे लिये अथाह प्रेम है,इसका परिचय उसने अपनी निडरता,निर्भीकता से दिया मेरे अच्छे के लिये वोह कुछ भी कर सकती है, मेरा अनुभव यही है,अपना उदारहण ही दे कर  सच्ची शिक्षा दी जा सकती है,इससे बड़ कर कोइ शिक्षा नहीं

बुधवार, अक्टूबर 31

व्यक्तित्व परिवर्तन

                                                           व्यक्तित्व परिवर्तन 


माँ क्षमा करना यदि कोई जाने अनजाने में गलती हो जाये,क्योंकि में सत्य घटना पर आधारित कहनी,लिख रहा हूँ ।


                                     सर्व मंगल मांगल्ये शरण्ये,त्रियाम्बके गौरी नारायणी,नामोस्त्ते

माता रानी विचित्र खेल हें,इस जग के,क्यों व्यक्तित्व में एसा परवर्तन हो जाता है,जो मानव अत्याधिक प्रेम करता है,वोह प्रेम विहीन हो जाता है,आज में खोज रहा हूँ,अपनी प्यारी सी भोली भाली,बिटिया को,कहां गयी वोह मेरी प्यारी सी बिटिया, जिस बिटिया का हिर्दय एक स्बस्थ प्रेम से भरा हुआ था,जो मेरी खुशी में खुश होती थी,और मेरी व्यथा को दूर करने का प्रयत्न करती थी,जाने कहाँ खो गयी है,माँ मेरी उस बिटिया को खोज के ला
ला दे माता रानी,माँ की प्रेरणा से यही समाप्त करता हूँ ।



बुधवार, अगस्त 1

प्रभु इश्वर, क्यों करता है मानव की भावना से खिलवाड़ ।


प्रभु इश्वर, क्यों करता है मानव की भावना से खिलवाड़ 

परमपिता परमात्मा, इन्सान को क्यों दी तूने भावना,और यह भावना ही मन को व्यथित करती है, क्यों रचता है,ऐसे खेल कि मानव हो जाता है,व्यथित,अधिकतर लोग इतने ज्ञानी तो नहीं होते,जो सुख और दुःख में सम रहें,और लोग कह देते है,पूर्वजन्म के कर्म,पर है,इश्वर कौन जनता है,पूर्वजन्म के कर्म,कभी किसी को उसके जीवन साथी को दूर कर देता है,और किसी के जीवन साथी को सदा के लिए दूर कर देता है, कि दूसरा जीवनसाथी रोता,बिलखता रह जाता है,कीसी को दे देता है संतान का वियोग ।
प्रभु क्यों बनाता है,एसे सयोंग,कि कुछ समय के लिए दो लोगों को एसे मिला देता है,कि कभी वियोग नहीं होगा,परन्तु एक ही तुषारपात ऐसा कर देता है,ऐसा वियोग हो जाता है,पता ही नहीं चलता भविष्य में सयोंग होगा कि नहीं,और किसी को भी नहीं ज्ञयात होता,भविष्य मैं क्या होगा,यह अनिश्चितता दे कर,क्यों असमंजस मैं पड़ जाता है ।
कहते है,सदगुरु से ज्ञयान मिलता है,परन्तु क्यों नहीं मिलता है हर किसी को सदगुरु,और मिलता भी तो साधारण मनुष्य कैसे समझ सकता है,कौन है सदगुरू,और मानव को पता चल जाये कि,भविष्य में,हानि होगी तो मानव सम्भल जाए ।
बस इस लेख का समापन इस कथा से करता हूँ,जब कृष्ण भगवन ने उधो को कृष्ण वियोग मैं,जलती हुई गोपियों के पास भेजा,तब जब उद्धव जी ने गोपियों को ज्ञयान देने का प्रयत्न किया तो गोपियों ने कहा,'ऊधो तुम्हारे जोग हम नहीं ।
वाह प्रभु तेरी विचत्र लीला 

शनिवार, फ़रवरी 11

प्रेम एक समर्पण बिना किसी शर्त के एक दुसरे को स्वीकार करने का ।

प्रेम एक समर्पण बिना किसी शर्त के एक दुसरे को स्वीकार करने का ।

आज कल बातावरण में,प्रेम शब्द गूँज रहा है,वेलनटाइन के नाम से,जो कि प्रेम के ग्रीक देवता का नाम है,मौसम भी धीरे,धीरे सुभावाना होता जा रहा है, इन्ही दिनों कामदेव जो कि हिन्दुओं के काम के देवता हैं,फूलों की सुगंध ने मौसम को खुशनुमा बना दिया है,और हो भी क्यों ना,कामदेव ने अपने तीर से फूलों का वाण जो छोड़ा है, रति और कामदेव की काम क्रीड़ा का मौसम जो आ गया है ।
जब मैंने पाश्चात्य सभ्यता के उदहारण से यह लेख लिखना प्रारंभ किया था,तब मेरे मस्तिष्क में,एक पाश्चत्य कहानी गुंजायमान हो रही थी,जिसका नाम है,गिफ्ट ऑफ़ मेजाइ,इस कहानी में एक दम्पति का एक दुसरे के प्रति समर्पण बताया गया है,वोह दम्पति आर्थिक रूप से गरीब थे,पत्नी के बहुत ही खूबसूरत सुन्हेरे बाल थे, और उसके पास बालों में लगाने के लीये कोई भी सुन्दर क्लिप नहीं थी,और पति के पास घड़ी तो अवश्य थी,परन्तु उसका पट्टा कोई खास अच्छा नहीं था,दिन आया क्रिसमस का जैसे कि पाश्चात्य सभ्यता में,उपहार देने होतें हैं,और सांता भी उपहार ही देते हैं,पति ने सोचा क्यों नहीं अपनी घड़ी बेच कर अपनी पत्नी के बालों में लगाने के लीये एक सुन्दर सा क्लिप खरीद लिया जाये,तो पति ने अपनी घड़ी बेच कर पत्नी के बालों के लीये सुन्दर सा रत्नजड़ित क्लिप खरीद लीया,और उधर पत्नी आकुल,व्याकुल की उसके मन में भी वोही व्यथा कि पति कलाई में घड़ी के लीये क्यों ना कोई सुन्दर सी सोने की चेन अपने सुन्दर सुन्हेरे बालों को बेच कर खरीद ली, यह होता है प्रेम जिसमे एक दुसरे ने अपनी सबसे अधिक मूल्यवान बेच कर एक दुसरे की आवश्यकता की वस्तु खरीद ली,और वेलेनटाइन,एक दुसरे के लीये कोई भी हो सकता है,किसी भी रिश्तें में,मित्रों में इत्यादि ।
इसी प्रकार हिंदी में कामदेव की कथा आती हैं,जिसका प्रारंभ होता है,शिव पार्वती जी के विवाह के बाद,भोलेनाथ पार्वती जी के रूप लावण्या में इतने आसक्त हो गये,कि वोह अपनी सुध बुध भूल बैठे, और उसी समय एक राक्षस  बहुत उत्पात कर रहा था,और उसका संघार शिव पार्वती का पुत्र ही कर सकता था, उस समय शिवजी को उस बंधन से निकलना बहुत अवश्यक था,अब भोलेनाथ का क्रोध तो सर्वविदित है, जब शिवजी का तीसरा नेत्र खुलता है,तो प्रलय आ जाती है, भयभीत देवता शिव शम्भू के पास जाने से डर रहे थे, आखिरकार कामदेव जी तेयार हो गये शिव जी की प्रेम लीला भंग करने के लीये,और कामदेव ने इसी प्रकार का मौसम बना दिया जिसे कहते है,वेलेनटाइन डे,और जैसे ही कामदेव जी ने शिवजी के हिर्दय पर  कामवाण का प्रहार किया,तो शिव का तीसरा नेत्र खुल गया और कामदेव का शरीर का नाश हो गया, इसी मौसम में कामदेव और रति काम क्रीड़ा करते हैं, यहाँ भी एक निष्काम प्रेम है,कामदेव ने जगत की भलाई के लीये अपने शरीर को नाश कर दिया,परन्तु रति युगों,युगों से उनके साथ है ।
मित्रों प्रेम कोई वासना नहीं है,यह एक उपासना है ।

रविवार, फ़रवरी 5

हिंदी और अंग्रेजी के प्राचीन दोहों तथा कथनों से सदा मार्ग ही प्रशस्त होता है ।

हिंदी और अंग्रेजी के प्राचीन दोहों तथा कथनों से सदा मार्ग ही प्रशस्त होता है ।

यदि हमारे मस्तिष्क में, विरोधावासी बाते विचरण कर रहीं हों,और हम कोई भी निर्णय नहीं ले पा रहें हों, तो उस स्थिति में, प्राचीन कथनों की और ध्यान दें,तो हमें प्राय: समस्या का समाधान भी मिल जाता है, जैसे हमारे मन में काम के प्रति आलस्य की भावना ने घर कर लिया हो,तो यह सोच लेने भर से की काम करना हमारा कर्तव्य है,और 
हमें इसका मूल्य मिल रहा है,तो हम अपने कार्य को पूरी ईमानदारी और निष्ठां से करेंगे, और यदि यह सोच लिया जाये कि यह प्रभु का दिया हुआ काम है,तो भी हम पूरी निष्ठां और ईमानदारी से कार्य करेंगे,इसी लिये अंग्रेजी में कहा जाता है,"work is worship"।
यदि बार,बार प्रयत्न करने मैं किसी कार्य मैं सफलता नहीं मिल रही है,तो निराशा में घिरने के कारण अगर अवसाद   दिलो दिमाग में घरकरने का प्रयत्न कर रहा हो,तो  यही कहा जाता है,"असफलता ही सफलता की सिड़ी है", या अंग्रेजी में "failure is the ladder of suucess", और यह सोचने से दिलो,दिमाग को बल मिलता है ।
यदि कोई दुर्घटना ऐसी हो जाती है,जिसका मनो मस्तिष्क पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है,तो कहा जाता है,
"समय सब घाव भर देता है",या अंग्रेजी में कहा जाता है,"Time is the great healer"|
मित्रता के बारे में कहा जाता है,"सच्चा दोस्त वोही है,जो कठ्नाई के समय में साथ देता है",या अंग्रेजी में कहा जाता है,"friend is need is friend indeed" |
महान कवी रहीम दास का एक दोहा है,जिसका आशय है,"थोरे समय की विपदा आनी अच्छी है,जिससे अपने प्राय का हमें ज्ञात हो जाता है",इसी सन्दर्भ में तुलिसिदास जी रचित रामचरितमानस में",लिखा धेर्य की परीक्षा विप्पती में होती है ।
सच्चे प्रेम के बारे में रहीम दास द्वारा ही लिखा गया,"धागा प्रेम का ना तोड़ो चटकाय,जो जोड़ो तो गांठ पड़ जाये"।
कबीर दास द्वारा कहा गया है,वाणी के बारें में,"इसी वाणी बोलिए मन का आप खोये,औरों को शीतल करे आप भी शीतल होये ।
कबीर दास जी का यह भी दोहा है,"बड़ा हुआ तो क्या हुआ,जैसे पेड़ खजूर,पंथी को छाया नहीं फल लगे अति दूर " 
कोई भी स्थिति हो तो उस के अनुकूल कथन मिल ही जायेगा ।
 यही सब सीख तो सच्चे गुरु देते हैं,इसी के बाद ही तो परमात्मा से साक्षात्कार करातें हैं ।
 मानव पुराने सीख देने वाले दोहे कथन का को याद करके,वातावरण को अपने अनुकूल बना सकता है ।
  अंत में इस लेख को इस दोहे से समापन करता हूँ,"काल करे, सो आज कर, आज करे सो अब,पल में प्रलय
होगी, भौरी करेगा कब।





बुधवार, जनवरी 4

प्रभु इस वर्ष सब के दुःख,दर्द पहचानने की और उनके दुःख दर्द दूर करने की क्षमता दो



प्रभु इस वर्ष सब के दुःख,दर्द पहचानने की और उनके दुःख दर्द दूर करने की क्षमता दो 


आज बहुत दिनों के बाद,कुछ समय मिला तो सोचा,गूगल टोक पर अपने परिचितों से,कुछ बात चीत कर लूं,है तो,दो लोग इस प्रकार के मिलें,जिनको कोई,ना कोई दुख था,एक ने तो स्पष्ट बताया,और एक ने बात करते,करतेकुछ कहा,और जब मेने कारण पूछने की चेष्टा करी तो,कुछ न  कह कर गूगल टोक से साईंन आउट कर लिया,संभवत: बहुत अधिक दुख था,नाम तो मे नहीं लिखूंगा,उसको दो तीन बार फ़ोन करने का प्रयत्न किया तो उसने फ़ोन नहीं उठाया,संभवत: वेदना अत्यधिक होगी,और जब वेदना अत्यधिक होती है,तब इंसान अपने पर काबू नहीं रख पाता,यही कभी ऐसे अवसाद का रूप ले लेता है, इंसान को कुछ अच्छा नहीं लगता,कुछ करने को मन नहीं करता,लाख उसको समझाने का प्रयत्न कर लो,पर अवसाद इतना तीव्र होता है,जो उसको मरनासन सा कर देता है,और वोह इस अवस्था से बहुत ही कठनाई से निकल पाता है,आस पास के लोग,उसके मित्र,उसके सगे सम्बन्धी उस की इस दशा को नहीं समझ पाते,वास्तव में सब अपने समझ के हिसाब से उसको देखते हैं,या उसकी बातें सुनते हैं,अपनी,अपनी समझ के अनुसार,शारीर पर लगी चोट और शारीरिक बीमारियाँ तो सब को दिखाई देतीं है,पर हिर्दय पर हुआ आघात,जो मानसिक दशा को उद्देलित कर देता है,वोह किसी को नहीं दिखाई देता है,और बहुत बार तो इंसान अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है,प्रभु,इश्वर,परमपिता परमेश्वर ,गोड,जिसेउस,अल्लाह,मुझे ऐसी शक्ति दो में उन लोगों की मानसिक दशा को अनुभव कर सकूँ,और फिर उनकी व्यथा दूर कर सकूँ,चाहयें वोह पास हो या दूर हो |
शारीरिक दशा के बारें में भी यह कहा जाता है,"जाकी ना फटे विवाई सो क्या जाने पीर पराई",में तो परमपिता परमेश्वर में तो आपसे मांगता हूँ,उनकी पीर का मुझे वैसा ही अनुभव हो चाहयें मानसिक हो या शारीरक ,जैसा वोह कर रहें हैं,और उन व्यथाओं को अनुभव करके दूर कर सकूं |
इस प्रकार की शारीरिक और मानसिक व्यथाओं को नहीं अनुभव कर पाता हूँ,तो बहधा स्वार्थी हो जाता हूँ,केवल अपने बारें में सोचता हूँ,तो है परमेश्वर में उन तकलीफों को अनुभवों कर सकूं,और उनको दूर कर सकूं |
 इस नववर्ष में मैंने,अपनी कोलोनी में,कुछ लोगों को असाध्य विमारियों से ग्रसित देखा,है सर्वशक्तिमान मुझे उनकी विमारियों को अनुभव करने और उनको दूर करने की शक्ति दो |
 जब कोई कुछ कहता है,या उसके हाव भाव से ऐसा लगता है,उसको कोई तकलीफ है,तो मुझको वैसा ही अनुभव हो जैसा उसको हो,तभी तो है इश्वर उसकी व्यथा दूर कर सकूंगा |
 इस वर्ष इश्वर से मेरी यही प्रार्थना है |
अंत मे,गुरु जी परमहंस की इन पंक्तियों के साथ इस लेख का समापन करता हूँ |

"प्रभु मुझे अज्ञान से ज्ञान की और
  अशांति से शांति की और
 इच्छाओं से संतुष्टि की और ले चलो





draft

गुरुवार, नवंबर 17

इस बार के अंतिम के.बी.सी सीजन 4 ने आम आदमी को निश्चित ही प्रोत्सहित किया |

इस बार के अंतिम के.बी.सी सीजन 4 ने आम आदमी को निश्चित ही प्रोत्सहित किया 


जब भी कार्यों के बीच मैं, समय मिलता है,तो बहुत सी अपनी रुचियों मैं दूरदर्शन देखना भी मेरी एक रुचि है,
ऐसा कुछ विशेष कार्यकर्म दूरदर्शन मैं देखना मेरी रुचि मैं शामिल नहीं हैं, पहले प्रज्ञा चेनल आया करता था,

जिसमें मेरी रुचि थी,लेकिन अब वोह चेनल बंद हो चूका है, अब तो रिमोट पर उंगलिय चलती रहतीं हैं,और चेनल बदलते रहते हैं, लेकिन जब मैंने के.बी.की का इस सीजेन का अंतिम चेनल,संभवत:4 पर तो मेरी रिमोट पर उंगलिया स्थिर सी हो गयीं,एक तो अमिताभ बच्चन जी,जिनकी गरिमामय हिंदी,और उनके हाव,भाव मेरे मन को छूतें हैं,और दूसरा आमआदमी का हॉट सीट पर होना,अमिताभ बच्चन जी का उनको प्रोत्साहित करना,और आम आदमी के सपने पूरे होते हुए,सचमुच मन को भा गए |
पाठक गण मुझे क्षमा करें,क्योंकि अधिक्तारों के में नाम नहीं जानता,केवल पाँच करोड़ जितने वाले सुशील कुमारके,जो कि आम इन्सान की श्रेणी में ही आतें हैं,जब सुशील कुमार का नाम यहाँ लिखा है,तो उन्ही से प्रारंभ करताहूँ,एक साधारण से कम्प्यूटर ओपरेटर,उनका सपना,उन बच्चों को शिक्षित करना,जिनमे प्रतिभा तो है,
पर धन की कमी के कारण उनकी प्रतिभा मुखरित नहीं हो पाती हैं,ऐसे बच्चों की परतिभा को मुखरित करना |
 एक और ऐसे इंसान का वर्णन करूंगा,जिनमे प्रतिभा तो थी,परन्तु उनकी हकलाहट ने तो जैसे उनकी प्रतिभा
को ग्रहण लगा दिया था,जो लिखित परीक्षा में तो वोह उत्तीर्ण हो जाते थे,परन्तु मौखिक परीक्षा में असफल,और उनोहने एक अच्छी राशी के.बी.सी में पचास लाख,जीत कर समाज के उन लोगों को आइना दिखा दिया,कि उनमे सामान्य ज्ञान की कोई कमी नहीं है,बस एक हकलाहट के कारण उनको असफल घोषित कर दिया जाता रहा ,उनलोगों को इनोहने दिया करारा उत्तर,अब तो बदल जाओ समाज के ऐसे लोग |
 उनकी इस सफलता पर उनके,बरबस निकले अश्रुओं ने मेरे मन पर ऐसा,प्रभाव छोड़ा,कि बार,बार
उनके गालों पर टपकते आंसू,और उनका बार,बार अपने को हताश,निराश कहना,बार,बार मेरे सामने आता
है,(उन सज्जन से कर बध,क्षमा,चाहता हूँ,पर क्या करूं अपने को यह लिखने से रोक नहीं पाया) |
कब बदलोगे अपनी सोच समाज के वोह लोगों,जिन्होंने,उस सफल व्यक्ति को असफल घोषित कर दिया
केवल,और केवल एक हकलाहट के कारण |
मुझे तो यह दो घटनाये याद हैं,पाठकगनों,के,बी,सी चार में,और इस प्रकार की घटनाएँ,ज्ञात हों,तो आप लोगों
को सहेज अनुमति हैं,मेरे इस संक्षिप्त से आलेख में जोड़ने के लिए |








रविवार, नवंबर 6

क्या बहुराष्ट्रीय संस्थाओं मैं ऐसा ही होता है |

क्या  बहुराष्ट्रीय संस्थाओं मैं ऐसा ही होता है |
बहुत  दिनों के बाद, यह लेख लिख रहा हूँ,और इस लेख के शीर्षक के समान नहीं सोच पा रहा हूँ, यह मेरे बलोग में लिखूं या इसी स्नेह परिवार में, आज कल मेरा सम्बन्ध एक बहुराष्ट्रीय संस्थासे है,जिसमे  मैं कार्यरत हूँ, इस संस्था मैं अनुभव करता हूँ, जो मुल्य आदर्श, हमारी पुरानी पीड़ी के महान व्यक्तियों ने जैसे कि महात्मा गाँधी मुख्यत: ने दिए हैं,और आज अन्ना हजारे जो उनके अनुयाई हैं, और जो उन्होंने भ्रष्टाचार विरोध की ज्वाला प्रजुल्ल्वत की उसको बिना जाने सोचे समझे, हमारी संस्था ने एक अभियान प्रारंभ किया है,और जिसका नाम रक्खा गया है,
"i am the change",और यहाँ यह कहना अनुचित न होगा,यह केवल और केवल अपने स्वार्थ के लिए धन उपार्जन के लिए, कहाँ वोह आन्दोलन निस्वार्थ और यहाँ स्वार्थ, क्या आज का यही परिवेश हैं ?
यहाँ उदहारण देते हैं, व्यगानिकों की खोजों का, अभिनेताओं के संघर्षो का जिसमे वरसो लग गए, जो कि यहाँ समय सीमा मैं निर्धारित है, हाल ही मैं हमारी इस संस्था मैं,एक आयोजन हुआ था,जिसका नाम रक्खा गया था,
"fire starter", और उसमें बहुत से उदहारण उधृत किये गए थे, जिसका मैं अपने लेखों मैं,अपने पूज्य गुरु जी 
स्वामी परमहंस योगंनद जी ने जो शिक्षा दी है,जैसे कि इंसान की विचारधाराओं पर प्रभाव पड़ता है,देश काल,लालन पालन समाज और परिवेश का, इसमें नया क्या है ? जो कि "fire starter" मैं बताया गया था
फिर यह बताया गया था ,कि इंसान के कुछ पुरबाग्रह होतें है, जिसके बारे मैं गुरु जी कहतें हैं,इसको बदलने मैं आठ वर्ष लागतें हैं, और इसमें तो हमारी संस्था ने दो तीन वर्ष निर्धारित कर दिए हैं |
 हम लोग तो खैर संस्था की और नियमित आय पर नहीं हैं, जो नियमित आये पर हैं,जब दो या इससे अधिक
 नियमित आये वाले मिलते है, तो हम अनियमित आये वालों से ऐसे मुहं फेर लेते हैं,जैसे कि हम अपरिचित हैं |
जब यह नियमित आये वाले आदर्शों की बात करतें हैं,तो ना तो इनकी भाव भंगिमा उसके अनुरूप दिखती है, ना ही वाणी |
क्या यही बहुराष्ट्रीय संस्थाओं मैं होता है ? 
समय मिला तो अपनी इस संस्था की अच्छी बांतो के बारें मैं भी लिखूंगा |

अभी तो एक प्रश्न चिन्ह ही छोड़ा है ?








 




 

बुधवार, मार्च 23

अक्सर सबको अपनी समस्या दूसरे से बड़ी लगती है |

अक्सर सबको अपनी समस्या दूसरे से बड़ी लगती है |


सिख पंथ के प्रथम गुरु श्री नानक जी ने कहा था,"नानक दुखिया सब संसार", यह विश्व भिन्न,भिन्न प्रकार के दुखों से भरा पड़ा है,और इस संसार मैं, सदा सत्य तथ्य ,मृत्यु,असाध्य रोग,और जरा,को छोड़ कर, लोगों के दुखों के अनेकों कारण हैं,परन्तु किसी को अपना दुःख दुसरे से बड़ा लगता है |
और इस संसार मैं,अनेकों महान,व्यक्तिव का अभिर्भाव हुआ था,हुआ है,और होता रहेगा,जो अपने कष्टों को भूल कर,प्राणियों का दुख दूर करतें रहें हैं,यह ऐसी महान आत्माएं हैं,जो वास्तव मैं जन्म,मरण के बन्धनों से मुक्त हो चुकीं हैं,यह लोग अपनी इच्छा से,औरों के कष्टों को दूर करने उनके आसूँ पोछने के लिए इस संसार मैं,आतें हैं,और अपनी इच्छा से अपना शारीर छोड़ देतें हैं |
सबसे पहले मैं, गौतम बुद्ध का नाम लेता हूँ,राजा शुद्धोदन के याहं इनका जन्म हुआ,और राजकुमार थे,राजा शुद्धोदन ने,ऐसा प्रबंध कर दिया,कि गौतम बुद्ध को,सांसारिक,सत्य तथ्य,रोग,वृधावस्था और मृत के दर्शन ना हों, परन्तु होनी तो बलवान है ही है, और एक दिन गौतम बुद्ध रथ पर बैठ कर जा रहे थे,तो इन्होने किसी मृत व्यक्ति को देखा,सारथी से पुछा तो उसने अन्यम्स्क सा उत्तर दिया,कि यह मृत्यु है,इसी प्रकार शने:,शने गौतम बुध को वृधावस्था,रोगी के दर्शन हुए तो,लग गए इन तथ्यों के अन्वेषण मैं,और आखिरकार इनको एक दीव्य प्रकाश दिखाई दिया,और एक मन मैं,सत्य,अहिंसा,प्रेम के बीज उत्पन्न हुए,और इन्होने संसार को यही सन्देश दिया |
प्रेम जो कि दीव्य प्रेम होता है,मन्युश को किसी वस्तु की इच्छा नहीं होती,कोई अपेक्षा नहीं होती, एक बार गौतम बुध अपने शिष्यों के साथ,एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए थे,इनके मुख मंडल पर दीव्य तेज था,एक स्त्री इनके तेज से आकर्षित होकर आई और इनको यह 'प्रियतम,प्रियतम",कह कर उनके मुख को चूमने लगी,और उसने कहा "आप मुझे क्यों नहीं छु रहे",तो गौतम बुध ने कहा मैं तुम्हे अवश्य छूऊंगा,जब तुम्हे आवश्यकता होगी,समय बीतता गया और,एक दिन गौतम बुध अपने शिष्यों के साथ बैठे थे, अचानक चिल्लाने लगे "मेरी प्रियतमा मुझे बुला रही है",और उठ कर चल पड़े एक वृक्ष के नीचे रोग के कारण उस सुंदर स्त्री का स्वरुप कुरूप हो चूका था,तब गौतम बुध ने कहा,प्रिये मैं आ गया और उस स्त्री को छुआ और उसका उपचार किया",यह था दीव्य प्रेम |
कहते हैं,"पूत के पैर पलने मैं दिख जातें हैं",अहिंसा तो बचपन से ही,इनके मन मैं थीं,एक बार इनके बड़े भाई ने एक हंस को वाण मार के घायल कर दिया',और गौतम बुध ने जब उसको देखा तो उसका उपचार किया,बाद मैं दोनों भईयों मैं,इस झगडे ने जन्म ले लिया है,बड़ा भाई कहने लगा यह मेरा है,मैंने इसे मारा है,गौतम बुध कहने लगे यह मेरा है,मैंने इसका उपचार किया है,आखिर फैसला राजा के पास गया,तो निर्णय यह हुआ जिसके पास हंस जायेगा,हंस उसका होगा,तब हंस गौतम बुध की गोद मैं जा कर बैठ गया,ऐसा था इनका पशु,पक्षी और मानव से प्रेम का सन्देश |
अक्सर इन महान पुरषों,स्त्रियों की आयु अधिक नहीं होती,यह तो निस्वार्थ मानव को प्रभु का रूप मान कर उनकी सेवा प्रभु की सेवा करतें हैं,और अपना काम समाप्त करके चले जातें हैं |
 यही सन्देश था स्वामी विवेकाननद जी का,उनका कहना था,"अपने आस पास देखो,जिसको भी किसी भी चीज की आवश्यकता है,उसको पूरा करो,यही परमेश्वर की सबसे बड़ी आराधना है,"मानव की सेवा ही प्रभु सेवा है",यह सन्देश था स्वामी विवेकाननद जी का |
 दुःख या कष्ट के,प्रमुख कारण होतें हैं |


अलग,अलग समाज,अलग,अलग परिवेश,अलग,अलग आयु के हिसाब से,शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक और आत्मिक दुःख,अलग,अलग प्रकार के होतें हैं,और हर कोई,दुसरे का कष्ट अपनी सोच,और निगाह,तथा,अलग,अलग,समाज,अलग,अलग,परिवेश,अलग,अलग आयु के हिसाब से देखने और समझने तथा सोचने वालों के हिसाब से सब को अपना,अपना कष्ट दुसरे से बड़ा लगता है,जब तक दुसरे की संवेदना मन्युष्य अपने हिर्दय मैं नहीं,अनुभव करेंगे तो अपना दुःख दुसरे से बड़ा लगेगा,मैंने कभी एक लेख लिखा था,अपना आत्मविश्लेषण कैसे करें,उसका स्वयम ही उत्तर दे रहा हूँ,दुसरे पर आपके व्यक्तिव का क्या प्रभाव पड़ता है,वोह हैं स्वयम का आत्मविश्लेषण,और उसके अनुसार अपने बारें मैं सोच कर अपनी कमियां दूर करें,तो होगा आपके व्यक्तिव का विकास |
यहाँ पर श्री राजीव कुमार कुल्श्रेसठ जी का धन्यवाद् भी दूंगा,मैं तो भाई ५८ वर्ष को हो चूका हूँ,उन्होंने मेरे दोनों ब्लॉग "www.vinay-mereblogspot.com", और "www.snehparivar.blogspot.com",को चमकाया,मुझे तो इस प्रकार ब्लॉग को चमकाना तो आता नहीं हैं,हमारा जमाना ७० के दशक का था,जिसको अब रेट्रो,रेट्रो कहतें हैं,क्यों कहते हैं,मुझे तो नहीं,मालूम क्यों कहतें हैं,अगर किसी को मालूम हो तो मुझे अवगत बताइयेगा, राजीव जी की निस्वार्थ सेवा का आभारी हूँ |
जो मेरे इस ब्लॉग के आरम्भ मैं लिखा है,वोही मेरा सन्देश है |
अगले भाग मैं, चर्चा करेंगे दुःख या कष्टों के क्या,क्या कारण होतें हैं, सबसे प्रमुख कारण तो किसी से अपेक्षा करना होता है |
और इस कष्ट या दुःख को किसी के मनोभावों को,दिमाग से नहीं,दिल से अनुभव करकें,उस व्यक्ति को जिस तरह से भी आपको उपुयक्त लगता है,उसको स्नेह दें,तो उसका कष्ट कुछ हल्का हो सकता है,आपको लग सकता है,यह तो बिना कारण के परेशान आपकी समझ से,परन्तु उसको अपना कष्ट गमभीर लग सकता है,इसीलिए ही कहता हूँ,दिल से अनुभव करके |
और सबसे बड़ी मूक भाषा प्रेम की है,जो पशु,पक्षी तक समझते हैं |
पशु,पक्षिओं का तो इतना ही स्वार्थ होता है,आप उनको खाने को देतें हैं,तो वोह बदले मैं,आपको प्रेम ही देता है,और यह प्रेम की मूक भाषा बनी रहती हैं |



क्रमश:











मंगलवार, मार्च 15

आइये जापान को और विनाश से बचाने के लिए प्रार्थना करें

आइये जापान को और विनाश से बचाने के लिए प्रार्थना करें 

आदिम युग से उस परम पिता परमात्मा की सृष्टि के नियम बिना किसी बदलाव के आज तक चलते आ रहें हैं, और भविष्य मैं चलते रहेंगे, या यह भी कहा जा सकता है,जब तक यह सृष्टि रहेगी परमात्मा के नियम वोही रहेंगे,सूर्य देवता सदा पूरब से निकल कर पश्चिम मैं ही अस्त होंगे जैसे की होता आया है,चंद्रमा पश्चिम से निकल कर पूर्व मैं ही अस्त होता आया है,और होता ही रहेगा,दिन के बाद रात, ग्रीष्म,वर्षा और शीत काल का मोसम,सदा की तरह यह अटल नियम ही रहेंगे, उस कलाकार ने इसी रचना कर दी है, जो कि सदा और सर्वथा एक सी है |
 कोई भी वस्तु ऊपर से पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की सीमा मैं गिरेगी तो नीचे ही गिरेगी, जन्म मिरतु का यह क्रम भी लगातार चल रहा है, और धर्म ग्रन्थ गीता के अनुसार,आत्माएं शरीर रुपी चोला ही,बदलती है,और हमें पूर्वजन्म की स्मृति नहीं रहती है, और हमको बार,बार अपने मैं  सुधर लाने का अवसर दिया जाता है, यदि हमें पुर्ब्जन्म की समिर्ती रहती तो हम अपने मैं सुधार इसलिए नहीं लाते कि हमें अवसर तो मिलेगा ही,और हमारा जीवन कष्टों मैं बीता होता,तो हममें नया जीवन जीने का साहस नहीं होता, यह प्रभु का नियम चलता ही चला आ रहा है |

सर आइजेक न्यूटन ने तीन नियम बनाये  

1. जो भी वस्तु ऊपर से गिरेगी वो नीचे ही गिरेगी |

२. जो वस्तु  गतिमान है, वोह गतिमान ही रहेगी, और जो वस्तु स्थिर है,वोह स्थिर ही रहेगी |

३. हर क्रिया की पर्तिक्रिया होती है |

यह न्यूटन के तीनो नियम,ऐसे ही चलते रहे |

परन्तु जब आइन्सटीन का युग आया तो उन्होंने न्यूटन के  तीनो नियमो को संशोधित किया |

१. जो वस्तु गुरुत्वाआकर्षण की सीमा मैं है,वोह वस्तु ऊपर से नीचे ही गिरेगी |

२. जो वस्तु गतिमान है,वोह गति मैं ही रहेगी  और जो वस्तु स्थिर है,वोह स्थिर ही रहेगी,जब तक उस पर बल ना लगाया जाये |

३. हर क्रिया के विपरीत उसी के बराबर की प्रतिक्रिया होती है |

परमात्मा को कभी भी अपने बनाये हुए नियोमो को संशोधित करने की आवश्यकता नहीं पड़ी, परन्तु मानव को कभी विज्ञानं के नियोमों को संशोधित करना पड़ा,और कभी तो एक थ्योरी के विपरीत दूसरी थ्योरी देने की
आवश्यकता पड़ी|

परमात्मा के नियम तो सदा ही स्थिर थे,और बहुत सी बातों का ज्ञान इंसान को नहीं था,तभी तो अर्केमेदेज़ टब मैं स्नान करने गये,तो उनको अनुभव हुआ,द्रव किसी वस्तु के आयतन जो उसमे डाली जाती है,अपने उतने ही आयेतन  को विस्थापित करता है |
परमात्मा का यह नियम तो सदा ही चला आ रहा है |

वोह मालिक प्रोटोपलास्म मैं जान डाल कर विभिन्न प्रकार के जीव बनता है,कीड़े,जानवर और इंसान,जबकि प्रोटोपलास्म को अगर माईकरोस्कोप के नीचे देखो तो एक से ही लगते हैं,वेशक इन्सान ने जानवरों के क्लोन बनाने मैं सफलता प्राप्त कर ली,जो कि बिलकुल ही स्वंतत्र रूप से नहीं बना था, परमात्मा की तरह स्वंतत्र रूप से 
नहीं बना था,जैसे सांसारिक जीवों से कोई भिन्न  जीव |

और उस कलाकार की रचना तो देखो, स्त्री पुरुष के शरीर,और हार्मोन मैं,बदलाव करके,बल्कि प्रत्येक जीव मैं,नर मादा बना कर इसी रचना कर दी, जिससे उन्ही के स्वरुप के जीव उत्पन्न होते रहे हैं,होते रहेंगे,केवल एक अमीबा को छोड़ कर जो की एक सेल का बना होता है,और जब उसका दूसरा सेल बनता है,तो दूसरा अमीबा बन जाता है, पुरुष वर्ग मैं टेस्टटरोन की अधिकता और स्त्री वर्ग मैं ओस्ट्रोजन की अधिकता होने के कारण,एक दुसरे के स्वाभाव मैं अंतर है  जो उनकी संतानों के लिए आवश्यक है,ऐसी  सरंचना की है,उस प्रभु ने |

मानव वैज्ञानिको ने बहुधा किसी एक विषय पर मतभेद प्रकट किया है, परन्तु प्रभु के नियोमों मैं कोई मतभेद नहीं है |
आज दूरभाष,दूरदर्शन, रेडियो,मोबाइल जितने भी संचार माध्यम हैं,वोह वायुमंडल मैं ध्वनि,और प्रकाश की तरंगे छोड़ने और प्राप्त करने पर आधारित हैं, जो इन वस्तुओं के अविष्कार होने से ही पहले वायुमंडल मैं थीं,

वायुमंडल मैं कोई भी तरंग जाती है,चाहें वोह मानसिक विचारों की हों,ध्वनि की या प्रकाश की हों,वोह वायुमंडल मैं उपस्थित इथ र को प्रभावित करतीं हैं,और उसका प्रभाव विश्व और विश्व के जीवो को प्रभावित करता है,आइये हम सब मिल कर, जापान के लिए प्रार्थना करें,और और अधिक से अधिक लोग प्रार्थना करेंगे तो,जापान को और त्रासदी से बचाया जा सकता है |

"परम पिता परमात्मा,भगवान कृष्ण, जीसिसस,सभी धर्मो के संत महानुभाव, हम अपने हिर्दय मैं,अपने भाई,बहनों का दुःख अनुभव कर सकें और हम आपका दिव्य प्यार अनुभव करें और उन अपने भाई,बहिन जो आपकी ही संतान है,जैसे की हम आपकी संतान है,आपका प्यार हमारे हिर्दय मैं हो,और वोह हम अपने भाई,बहनों को बाँट के इस भयानक त्रासदी से बचा सकें |"

यह प्रार्थना समूह मैं एक साथ एक ही समय पर करें तो वायुमंडल मैं इथर प्रभावित होगा,और इस प्रार्थना का प्रभाव  अवश्य पड़ेगा |

स्नेह परिवार की ओर से प्रार्थना 

समांहुयिक प्रार्थना मैं बहुत बल है |
   

शुक्रवार, फ़रवरी 4

परम पिता परमेश्वर एक रास्ते अनेक फिर क्यों विवाद |

   परम पिता परमेश्वर खुदा,अल्लाह,गोड सभी तो परमात्मा की ओर पहुचने के रास्ते हैं,फिर यह मजहब,धर्म को लेकर विवाद क्यों ?, हिन्दू धर्म में साकार,निराकार,और भिन्न देवी देवता हैं,जिसकी परमात्मा की ओर पहुचने की रूचि है,वोह उसी प्रकार से उस सर्वशक्तिमान की ओर पहुचने के लिए प्र्यतानशील है,हिन्दू धर्म में साकार स्वरूप की भक्ति करने वालों का विवाद निराकार भक्ति करने वालों से श्रेष्ठता को लेकर विवाद होता रहता है,और साकार स्वरुप की भक्ति करने वालों में भी अपने,अपने स्वरुप के ईश्वर को लेकर विवाद होता रहता है,और नवधा भक्ति को लेकर विवाद होता रहता है कि कर्म योग,भक्ति योग,ध्यान योग इत्यादि में इस प्रकार की भक्ति श्रेष्ठ है या उस प्रकार की भक्ति श्रेष्ठ है, फिर पन्थो को लेकर विवाद कबीरपंथ,जैन पंथ,बौध धर्म इत्यादि में यह पंथ श्रेष्ठ है या वोह पंथ|
सब में ईश्वर का अंश अविनाशी आत्मा है,और फिर क्यों ब्राहमण,क्षत्रिय,वैश्यों और शुद्र में क्यों यह जाती सबसे ऊपर है,या वोह  जाती निम्न है, जब सब में ईश्वर का अंश आत्मा है,तो इन जातियों में भेद भाव तो होना ही नहीं चाहिए,सब जातियां बराबर हैं
संत कबीर दास के अनुसार तो "हरी को जो भजे हरी का होई" |
 इसलाम को लिया जाये तो वहाँ शिया और सुन्नी में मतभेद समझ में नहीं आता है ऐसा क्यों है ?हैं तो आखिर दोनों मुस्लिम संप्रदाय,एक पहले से शिया जो मुस्लिम संप्रदाय में आतें हैं,और सुन्नी जो कि सुन कर मुस्लमान हुएं हैं,क्या इनके लिए खुदा,अल्लाह पीर,पैगम्बर जुदा है ? यदि खुदा,अल्लाह पैगम्बर,पीर जुदा नहीं हैं,तो आपस में क्यों एक मुस्लिम सम्प्द्रय एक दुसरे को अपने को बेहतर  क्यों बतातें हैं ?
इसी प्रकार अगर इसाई धर्म को मानने वोलों में भी,मतभेद क्यों ? इस इसाई धर्म की भी अनेक शाखाएँ हैं, केथोलिक,
प्रोटेस्टेंट,एडवेनटिस्ट,इत्यादि क्या इन इसाई धर्म को मानने वालों के लिए जिसयस अलग है,या खुदा कहें या गोड कहें क्या वोह अलग है,फिर आपस में यह कहना कि यह रास्ता अच्छा है,या वोह रास्ता अच्छा है,कहाँ तक ठीक है ?|
सबकी रगों में खून का रंग एक,सब के लिए धुप,छाओं,गर्मी,सर्दी बरसात एक,ईश्वर,भगवान,गोड,खुदा ने तो कोई पक्षपात नहीं किया,फिर कब समझोगे,सब इंसान एक हैं,परम पिता,परमेश्वर,गोड,खुदा के सब बच्चे हैं,धर्म तो उस सर्वशक्तिमान के पहुचने की,अलग,अलग सिड़ी है,जो परमेश्वर से मिलाने के जरिये हैं,परन्तु आपस में,मतभेद,बैर,लड़ाई,झगड़ा धर्म को लेकर और इंसानियत को भूल जाने पर,यह सिड़ी कहीं भी नहीं ले जाएगी |
अंत में इस कहानी से करता हूँ, एक महावत के पॉँच   अंधे बेटे थे,एक दिन महावत ने अपने बेटों से  कहा,इस हाथी को स्नान करा दो,उसके अंधे बेटे लग गये उस महावत के हाथी को नहलाने में,जब उसके बेटे हाथी को नेहला चुके तो उस महावत के अंधे  बेटों में हाथी को लेकर  झगड़ा होने लगा हाथी ऐसा,हाथी वैसा है,जिसके हाथ में हाथी के पैर आये उसने कहा हाथी  चार खम्बो जैसा है,जिसके हाथ में हाथी के कान आये उसने कहा हाथी,केले के बड़े,बड़े  पत्तों की तरह है, जिसके हाथ में हाथी की सूंड आयी उसने कहा,हाथी एक उस तरह के खम्बे की तरह है जो नीचे से पतला होकर जैसे,जैसे ऊपर जाओ तो मोटा होता जाता है,जिसके हाथ में हाथी के दांत आये वोह बोला हाथी तो हड्डियों से बना हुआ है,जिसके हाथ में हाथी की पूँछ आयी वोह बोला हाथी एक रस्सी की तरह है,जो स्वर्ग,जन्नत,हेवन से लटक रही है, क्योंकि हाथी की पूँछ ऊंचाई पर थी इसलिए उसने ऐसा कहा |
महावत ने जब उनको झगड़ा करते हुए देखा तो उसने कहा तुम सब आंशिक रूप से ठीक कह रहे हो, हाथी इन सब वस्तुओं का सम्मिलित रूप है,तो भाई बहनों, हाथी को उन महावत के बेटो ने अलग,अलग तरह से पहचाना तो यह अलग,अलग तरह के धर्म,सम्पर्दाय अलग रास्ते हैं,उस परम पिता परमेश्वर की ओर पहुचने के,जैसे नदी सागर में मिलने के बाद अपना सवरूप भूल जाती है, उस नदी में बहुत,वेग होता है,इठलाती है,अलग,अलग नदियाँ होतीं हैं, और जब उस शांत सागर में मिलती हैं,तो अपना स्वरुप भूल जातीं हैं,ऐसे ही जब मानव परमात्मा में लीन हो जाता है,तो इन धर्म,सम्पर्दय इत्यादि का कोई महत्व नहीं रह जाता है, और जब आत्मा जो की परमात्मा का स्वरूप है,उसी में लीन हो जाती है,तो मानव निर्मित धर्म,सम्प्रदाय को कोई महत्व नहीं रह जाता है |
आत्मा अंश जीव अविनाशी,उस अविनाशी ईश्वर का स्वरुप है | 

बुधवार, दिसंबर 29

आते हुये दिस्म्बर महिने की अन्तिम तिथी,और मध्य रात्री के बाद नववर्ष का स्वागत ऐसे करें तो कैसा है ?

रात्रिकाल का वर्ष के अन्तिम माह की मध्य रात्रि को बुड़ा हुआ वर्ष को नवजात नये वर्ष को सदा के लिये अलविदा कह कर जाता है,और इस आते हुये नववर्ष मनाने  के लिये हम लोग सुदूर देशों या अपने ही देश में यात्रा करते है, यदि हम यह सोचे कि बहुत से लोगो का तो समय एक ही स्थान पर जन्म से मृत्यु प्रन्त अपना सम्पुर्ण जीवन बिता देते हैं,उनके लिये तो नववर्ष का कोई मोल नही है,यदि हम लोग उनके होन्ठो पर मुस्कराहट और उनकी उदास आखों मे उस दिन आशा की चमक उत्प्न्न कर सकें तो कैसा रहे ? प्राय: यह शीतकालीन समय होता है, और इन लोगों के पास तन ढकने के वस्त्र नहीं है,और शीत लहर के कारण इनके हाड़ कम्पक्म्पाते है,यह बेबस मातायें,बहने बेटिया अपने फटेहाल वस्त्रॊ से, अपने तन को ढकने का असफल प्रयत्न करतीं है,इनको अगर अपने वोह वस्त्र जो हम लोग यदा कदा पुराने समझ कर उनका उपयोग नहीं करते या फेंक देते हैं,यदि इन बेबस लोगों को यही वस्त्र दे कर इनकी असफल प्रयत्न को सफल बनाने में सहयोग दें तो कैसा रहे ?
देर मध्य रात्री से बहुत  लाउडस्पीकर की तीव्र ध्वनि से प्रारम्भ करके और भोर के पहल्रे प्रहर तक के नाच गा कर हम अपना  मनोरंजन करते है, उनका भी हम सोचें जो रोगी है या उनके यहां कोई शोक है,यदि हम उनसे संवेदना नहीं रख पाते,कम से कम उनके रोग या शोक में इस उचीं ध्वनि से उनको कष्ट ना पहुंचा कर अपनी सभ्यता का परिचय दें तो कैसा रहे ? यदि ऊँची ध्वनि पर नाच गा कर नववर्ष का स्वागत करना ही चाहते हैं,तो ऐसे उपुक्त स्थान का चयन करें जिस स्थान से किसी को कष्ट ना  पहुंचे |
जब भी नववर्ष आता है, मदिरा का अनाप शनाप सेवन होता है,और लोग इसके नशे में अपना सयंम  खो देते हैं,अगर हम उन लोगों के बारे में भी किंचित सोचे जिनको दूषित जल पीने के लिए प्राप्त हो रहा है, और जो अनेक जल जनित रोगों को उत्पन्न कर रहा है,उनके बारें में भी ध्यान दें तो कैसा रहे ? हजारो,लाखों करोड़ों इस मदिरा के सेवन पर व्यय कर देते हैं,यदि हम उनके बारे में भी सोचे जो  आज कुछ धन जुटा पायें हैं,और कल कैसे जुटाएंगे उसकी चिंता है, उनकी थोड़ी आर्थिक सहयता कर दें तो कैसा रहे ? किसी को भी विदर्भ के किसानों की तरह कर्ज के बोझ के कारण आत्महत्या ना करना पड़े |
यदि हम लोग अत्यधिक  भोजन लेकर और अन्न देवता को फ़ेंक कर माँ अन्नपूर्णा का अपमान ना करके,उन लोगों के बारें में भी किंचित ध्यान दें उन लोगों का जो भूखे पेट रह कर अपनी दिन और रात बिता देतें हैं,कोई विवश माँ अपने नवजात शिशु को भूखी रह कर अपना दूध पिला रही है,उसके बारे में सोचे तो कैसा रहे ?
आखिर कार हमारा यह भारतवर्ष दया,दान,सहनशीलता,क्षमा इत्यादि गुणों के लिए विख्यात था,जो गुण अब अब धूमिल होते जा रहे हैं,या समय की गर्त में कहीं खो गएँ हैं,उन को पुन: जीवित करें तो कैसा रहे ? राष्ट्र,जाती,प्रान्त और भाषा का विवाद मिटा  कर विश्व बंधुत्व की भावना को पुन: जीवित करें तो कैसा रहे ?
व्यावहारिक क्रियाओं के लिए यदि कुछ किसी को सबक सिखाना भी पड़े,तो विषधर सर्प की भांति फुफकारना ना छोड़ें,परन्तु विष से आघात ना करें |
सब का नववर्ष सब प्रकार की खुशियाँ देने वाला हो | 

गुरुवार, दिसंबर 16

बिहारी जी की शरण में (भाग २)

गतांक से आगे
फेसबुक का सिलसिला तो चलता ही रहेगा,अभी मैंने फेसबुक का जो खाता फकीरा.चन्द के नाम से बनाया था,जैसे राजीव जी की मंत्रणा मुझे टिप्पणी के रूप में मिली थी,उस पर विचार करके उस खाते को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है,और उसके बाद भी जो मेरा फेसबुक का खाता vinay532007@gmail.com के नाम से है,इस खाते को तुरंत खोल कर देखा,तो वोही फिशिंग की समस्या,फेसबुक को फकीरा चंद वाले खाते में,यह भी बता दिया है, कि मैंने इस खाते को क्यों अस्थायी रूप से बंद किया है, राजीव जी फकीरा वाले खाते में,मैंने स्वयं को अपना मित्र बना रखा है,और जब में फकीरा वाला खाता खोलता हूँ,में स्वयं को और अपने मित्रों को उसमें पाता हूँ, वोह मेरा फकीरा वाला खाता सुचारू रूप से चल रहा है,सम्भवत: आपने मेरा फकीरा वाला खाता देखा होगा,एक दो दिन बाद देखेंगे ऊंट किस करवट वैठेगा, और फेसबुक द्वारा बतये हुए,एंटी फिशिंग में रिपोर्ट भी
दे दी है, इस मसले को तो छोड़ते हैं बिहारी जी के पास जैसा उचित समझेंगे वोह करेंगे |
 अब वोह समय प्रभु कृपा से आ ही गया,कि उन सज्जन की कहानी बताऊँ,जिनोहने अपने को सम्पुरण रूप से बिहारी जी की शरण में छोड़ दिया है, मुझे तो उनके सम्पुरण व्यक्तिव के विरोधाबस ने आश्चर्य में डाल दिया है,वोह सज्जन उसी संस्था में एक उच्च अधिकारी के रूप में काम करते थे जिसमे में था मोदीपोन मोदीनगर में , क्योंकि में तो तकनिकी बिभाग में था,परन्तु वोह थे संस्था के संचालन बिभाग में,तो यह तो ज्ञात नहीं कब उनकी मोदीपोन संस्था को छोड़ने की अवधि आ गयी, हाँ उनका एक दम शानदार व्यक्तिव भौतिक रूप में,शानदार वस्त्र उनके शरीर पर,और संस्था के द्वारा दी हुई,ड्राइवर सहित एक एम्बेसेडर गाड़ी,जब उनकी संस्था छोड़ने की अवधि आयी,तो वोह और मालिकों के द्वारा अनेको प्रकार के प्रलोभन देने के बाद भी और संस्था को सेवा नहीं देना चाहते थे,उनका यही कहना था "अब तो में जाऊंगा गोवर्धन बिहारी जी की शरण में ",मालिक बोले फिर तो तुम्हे कोई पहचानेगा नहीं",उनका उत्तर "यही तो में चाहता हूँ", यह लेख लिखते,लिखते मुझे मीराबाई जो की एक राज कुमारी थीं,उनके पद की पंक्तिया याद आ रहीं हैं,जिनमे से प्रमुख तो यही है,"जिसके सिर पर मोर मुकुट है,मेरा तो पति सोई", और "लोक लाज खोई संतन के ढिग बैठ के",हैं तो बहुत सारी पर इस बात को यहींकह कर  समाप्त करता हूँ, "ऐसी लगी लगन मीरा प्रभु के गुण गाने लगी",एक राजकुमारी मीराबाई जिन्होंने सब कुछ त्याग कर एक सन्यासिन हो गयीं,संभवत: ऐसा ही उनका भाव था, और स्वामी परमहंस योगानन्द की यह पंक्तिया याद आ रही हैं,जब हम इस जग में आते हैं,तो हमको कुछ चीजे अस्थायी रूप से प्रयोग करने को दे दी जातीं हैं,और फिर ले लीं जातीं हैं, महान योधा सिकंदर जिसने दुनिया पर विजय प्राप्त की थी,उसने यह इच्छा जाहिर की थी,मेरी मृत्यु के समय पर मेरे दोनों हाथ ताबूत से बहार निकाल कर रखना,जिससे जग को यह पाता चले की में खाली हाथ आया था और खाली हाथ जा रहा हूँ, यह मैंने इस लिए उदहारण दिए कि संभवत: उनके मन में यहीं भाव होंगे,उन्होंने तो गोवर्धन की परिक्रमा के रास्ते  में अपना घर बना लिया था,और अपनी पत्नी के साथ वहाँ रह रहें हैं,चूँकि मेरे पिता जी मथुरा के हैं,इसलिए मुझे गोवर्धन जाने का और उनसे मिलने का सोभ्याग्य मिला,और उनके वस्त्र अस्त,व्यस्त थोड़ी,थोड़ी दाड़ी बड़ी हुई,और उनके घर में ही उनका साधना कक्ष, और हमारा सौभाग्य था,उन दिनों उनका मौन ब्रत नहीं था,नहीं तो वोह माह में १५ दिन का मौन ब्रत रखते हैं, अपने घर पर उन दोनों पति,पत्नी ने हमारा सत्कार घड़े के पानी पिला कर बाकि तो चाय इत्यादि पिला कर किया, बातों,बातों में पता चला कि उन्होंने फ्रिज रखा था, लेकिन एक दिन वोल्टेज अधिक आने पर उनका फ्रिज ख़राब हो गया, उन लोगों ने यह सोच कर फ्रिज ठीक नहीं करवाया,कि बिहारी जी नहीं,चाहते कि फ्रिज रखे ,उन लोगों ने दूरदर्शन भी रखा था,उसको बन्दर तोड़ गये,और उन्होंने यही सोच कर दूरदर्शन  ठीक नहीं करवाया बिहारी जी नहीं चाहते दूरदर्शन रखें बस केवल एक ट्रांजिस्टर ही है उनके पास, उनका कहना है कि यह इसलिए रखा है कि बहार का समाचार मिलता रहे और उनकी पत्नी की प्रशंसा करनी पड़ेगी कि वोह भी उनका साथ बखूबी निबाह रहीं हैं,यदा कदा वोह अपने बच्चो के पास चले जाते हैं,या उनके बच्चे उनके पास आ जातें, उनके घर के पास ही मोदिभावन हैं,जो भी उन लोगों के निमंत्रण आते हैं, यही सोच कर मोदिभावन के कर्मचारी उनको नहीं देते, कहीं मौन ब्रत में तो नहीं है |
बस उनकी आस्था के बारे में बात करके इस लेख को पूरण विराम देता हूँ, वोह स्वयं दिल के रोगी हैं, और एक बार वोह और उनके बच्चे पास ही बरसाने में,राधा रानी के दर्शन करने आये थे,वोह इतनी अधिक सीडिया चढ़ कर राधारानी के मंदिर में हिर्दय रोगी होते हुए भी सबसे पहले राधारानी के मंदिर में पहुँच गये,और कहना यह था आप एक कदम स्वयं चलते हो और प्रभु दस कदम चलाते हैं |

समाप्त

राधे,राधे |

मंगलवार, दिसंबर 14

(प्रथम भाग) बिहारी जी की शरण में |

कुछ व्यस्तताओं जैसे, फेसबुक की फिशिंग समस्या के चक्रवात से निकलने का प्रयत्न, जिसको बार,बार सुलझाने का असफल प्रयत्न क्योंकि इस फेसबुक में मेरे 68 मित्र हैं,और फेसबुक कहता है,"There seems some suspicious activity,your account has been temporary suspended due to pishing", इस फिशिंग का अर्थ तो मुझे पहले ज्ञात नहीं था, परन्तु इस महान फेसबुक ने मुझे कोई सहायता तो नहीं दी, परन्तु मुझे इस फिशिंग का का ज्ञान अवश्य दिया है, जिसका अर्थ मेरे अंतर्मन को आहात कर के यह ज्ञान दिया है, फिशिंग का अर्थ होता है,किसी ने बिलकुल फेसबुक लगने वाला साईट मेरे नाम से बना लिया है,यह अवश्य है,मैंने एक फेसबुक का खाता, fakira.chand@yahoo.com के नाम से अवश्य बनाया है,और इसमें में, श्री राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ जी के हिंदी में लिखे हुए अध्यात्मिक लेखों का अंग्रेजी अनुवाद करता हूँ,फेसबुक के शीर्ष अधिकारीयों क्या यही मेरा अपराध है ?,में तो एक साधारण सा व्यक्तिव रखने वाला साधारण व्यक्ति हूँ,औरआप लोगों ने तो मुझे असाधारण समझ कर,इस फिशिंग रोग से अवगत कराया है,और भाई लोगों मेरे मेल में, फेसबुक वालों लोगों की प्रार्थना भेज कर मेरे जले पर नमक तो नहीं छिडको की में असहाय पर कटे पंछी की तरह तडपता रहूँ, सहयता ना दो तो यह काम ना करो, बार,बार मेरा चित्र दिखा कर पूछते हो,क्या यह आप हैं,और आप लोग जो,जो पूछते हो उसका उत्तर में हीं तो देता हूँ, और इस पहचान का यही परिणाम निकलता है,वोही धाक के तीन पात,संतोषजनक उत्तर पा कर फिर वोही वाक्य दोहराना और इस ब्लॉग का स्वामी भी में हूँ, इसमें में भी मेरा वोही चित्र है, जो फेसबुक में है, मेरे पास आधुनिक डिजिटल केमरा तो नहीं है, बस वोही चित्र होतें हैं,जो हमारे बेटी,दामाद खींच जाते हैं,और उनका भी आपकी फेसबुक में खाता है,इससे अधिक क्या सबूत
दूं ? आप फिशिंग रोग से ग्रस्त हो, यह लेख लिखते,लिखते दो बार, विद्युत् प्रबाह रुक गया था,लेकिन वोह तो फिर सुचारू होकर उसने मेरे लेख के प्रबाह को वेग दे दिया,परन्तु फेसबुक वालों जब हम भारतियों का किसी समस्या का हल नहीं निकलता तब हम कहते हैं,अब समस्या का हल प्रभु ही निकालेंगे,और मजबूर होकर हम लोग अपने मुखारविंद से श्री रामचरितमानस की यह चोपाई निकालते  हैं|
"होई है सो रामराची राखा |"
को करी तर्क बड़वाही शाखा || "
मेरे मित्रगनो ने मुझे यह सलाह दी दूसरा फेसबुक का खाता बना लो,फेसबुक वालों अब में यह ना करुँ तो क्या करुँ ?
 मित्रो एक तो लेख ना लिखने का कारण उपरोक्त था कारण था ,और दूसरा कारण यह है,कि मैंने एक अपना  वेबसाइट "www.vinay-sharma.qapacity.com" बना लिया है, और वोह साईट अपनी सबसे अच्छी मित्रों में से श्रीमती सरोजिनी साहू जी,जो कि एक प्रज्ञात लेखिका हैं,और मेरे मनोबल को दिशा देतीं हैं,उनके काम से श्री गणेश किया है और उस वेबसाइट पर प्रयोग करता रहा, "आज मुझे राजीव जी का मेल मिला" विनय भाई,क्या बात है,आप कहीं नजर नहीं आ रहे और ना ही कोई लेख लिख रहें हैं ",उनको तो मैंने उत्तर दे दिया था, कहते हैं ना,जब बीज को उपजाऊ भूमि मिलती है,तो बीज अंकुरित होता है,यही कारण है,जिस कारण मेरे मन में लेख लिखने का बीज
अंकुरित हो गया,नहीं तो हम तो फेसबुक के गम में बैठे हुए थे,और छोड़ दिया था,इस फेसबुक की समस्या को बिहारी जी की शरण में कह कर |
 में तो सब देवी,देवताओं,म्हापुरशों को मानता हूँ, पर इस बिहारी जी की शरण में मुझे क्यों याद आया,अगले लेख में,बहुत से लोगों को टिप्पणियाँ प्राप्त करने का मोह होता है,में भी इस रोग से अछूता नहीं हूँ,नहीं मिलती तो बिहारी जी की शरण में, अगले लेख में,उस व्यक्ति के बारे में लिखूंगा,जो कि मोदीपोन संस्था में एक बहुत ही बड़े अधिकारी थे, जब वोह अपनी नौकरी छोड़ कर जाने लगे तो उनको मालिकों ने अनेक प्रकार के प्रोलोभन दिए,यह भी कहा कोई तुझे जानेगा नहीं, लेकिन वोह नहीं रुके और उनका उत्तर था,यही तो में चाहता हूँ,और वोह अपनी पत्नी के साथ चल पड़े गोवर्धन और गोवर्धन कि प्रक्रिमा के रास्ते में,अपना आशियाना बना लिया है,और वोह मियां,बीवी दोनों गोवर्धन में सन्यासी जीवन व्यतीत कर रहें हैं |

बस इस लेख के इस प्रथम भाग का समापन यही कह कर करता हूँ |

"राधे,राधे बोले चले आएंगे बिहारी "
राधे,राधे |
                                                                                               (क्रमश: कब ? यह ज्ञात नहीं ?)

गुरुवार, अगस्त 5

सच्चे साधू संत का संसर्ग अवगुणों को गुणों मे परिवर्तित कर देता है |

मेरे को  इस ब्रह्माण्ड के लौकिक और अलौकिक रहस्यों की जिज्ञासा सदेव रही है, पड़ाई तो विज्ञान की की है, भौतिक शास्त्र, रासयन शास्त्र और कुछ सीमा तक जीव और वनस्पति विज्ञान, स्नातक का अध्यन किया टेकनोलिजिकल  इंस्टिट्यूट ऑफ़   टेक्सटाईल्स भिवानी से मतलब की वस्त्र तकनीक जिसमे थोड़ा यांत्रिक और विद्युतीय ज्ञान भी  दिया दिया  जाता है, मुख्य उद्दशेय तो वस्त्र तकनीक का होता है,और इसमें भी तीन भाग होतें हैं, कपड़ा बनाने की तकनीक पहला भाग,कपड़ा रंगने की तकनीक दूसरा भाग,और सिंथेटिक कपड़ा बनाने की तकनीक तीसरा भाग, जब मेंवस्त्र तकनीक का  सनातक हो गया,मुझे नौकरी मिली सिंथेटिक पोलीइस्टर का रेशा या ऐसे समझिये रुई बनाने के संसथान में, जिसमें रसायन विज्ञान का अधिक उपयोग होता है, बाकि ऊपर लिखी यांत्रिक और विद्युतीय  तकनीक तो काम में आतीं ही हैं,और क्रमश उन्नति होती गयी और प्रारंभिक पद से लेकर उच्चतम पद पर पहुँच गया था,और इस बीच में मेने कुछ संसथान भी बदले और पोलीइस्टर और नाईलोन का धागा बनाने के संस्थानों में काम किया  ,यहाँ पर एक रूचिकर बात बताता हूँ, न्यूयोर्क और लन्दन में एक साथ इस धागे का एक साथ अविष्कार होने के इस धागे का नाम नाईलोन पड़ा |
काम के कारण  मुझे नई,नई मशीनों के बारें में अध्यन करना पड़ा,और देश विदेश में मशीनों से  सम्बंधित कार्यों के कारण भ्रमण करना पड़ा, और सरकारी तथा गैर सरकारी कार्यप्रणाली को समझना पड़ा  क्योंकि यह संसथान चलाने के लिए आवशयक था, संभवत: इसी कारण जीवन के 56 बसंत देखने के बाद भी नई,नई जानकारी लेने की जिज्ञासा बनी रहती है,और इस 6 अगस्त को 57 वें बसंत का प्रारंभ हो जायेगा,और में भी उन लोगों की कतार में हूँ, जो मानते हैं आयु तो मात्र एक संख्या है, और इसी कारण मैंने अपने 50 वर्ष की आयु में,कम्पुटर सॉफ्टवेर सीखा |
यह तो सब रहा वैज्ञानिक ज्ञान के बारें में, अध्यातम के बारे में जानने की ललक तो प्रारम्भ से ही थी, इस कारण मैंने,    अनेकों धार्मिक,अध्यात्मिक पुस्तकों का अध्यन किया,बहुत से सिद्ध और साधारण मंदिरों,गुर्ददवारों,चर्चों में भी गया, बहुत से धर्मगुरु,पंडितो,संतो, सड़क के और दूसरे प्रकार के साधुओं तथा ,तांत्रिकों से मिला बस ओझाओं को छोड़ कर, इस कारण बहुत से कड़वे,मीठे अनुभव भी हुए, एक तांत्रिक मुझे ऐसा मिला,जो प्रारम्भ में तो मेरे मन को भा गया,परन्तु उतरोतर मुझे उसके असली रूप का क्रमश : पता चलता गया,उसको लोग गुरु जी कहते थे,और वोह हमारी कोलोनी के एक मंदिर में,हर रविवार को भैरो का दरबार लगाते थे, तथा मंगलवार को हनुमान जी का चोला चडाते थे, और उसके लिए उसको गुरु जी कहने वाले में समदर्शिता नहीं थी और में भी समदर्शिता नहीं वाले की श्रेणी में आता था , क्यों पड़ा उसके चक्कर में यह कभी बाद में लिखूंगा, और एक बार मैंने उनसे कुछ प्रश्न किया,और उसने मुझे ऐसा फटकारा की में तो चार दिन लगातार सो ही नहीं पाया, और विक्षिप्त अवस्था में पहुँच गया, इससे पहले माँ अम्बे का ध्यान किया करता था, किसी समय मैंने योगदा सत्संग सोसाइटी की सदयस्ता ली थी,इस कारण परमहंस योगानंद जी के जीवनउपयोगी  एक अध्याय हर माह आता था,और में उसके अनुसार जीवन का अनुसरण करता था, लेकिन उस फटकार के कारण में विक्षिप्त अवस्था में पहुँच गया था,ना माँ अम्बे का ध्यान,ना योगानंद जी अध्याओं के अनुसार जीवन का अनुसरण,ना नहाना ना वस्त्रों का ध्यान ऐसी अवस्था थी वोह  |
बहुत से मनोचिक्त्सक को दिखाया कोई विशेष लाभ नहीं मिला,और यह मुझे ज्ञात नहीं कैसे संभला और माँ अम्बे का ध्यान करने लगा और जैसे एक आम इन्सान को जीवन बिताना चाहिए वैसे विताने लगा |
रुचि तो अध्यातम और रहस्यों को जानने में सदा ही रही है,और नेट पर राजीव जी जो साधू जीवन व्यतीत कर रहें हैं,उनके आजकल में लेखों का,हिंदी से अंगेरजी अनुवाद कर रहा हूँ, उनके एक लेख काली चिड़िया का रहस्य पर मैंने एक टिप्पणी दी थी,और राजीव जी मेरी टिप्पणी का आशय समझ गये,और उसके वाद उन्होंने मेरे से उनके लेखों का अंगेरजी अनुवाद करने को कहा, और जो में www.spiritualismfromindia.blogspot.com में कर रहा हूँ, और उनसे मेरी जिज्ञासा शांत हो रही है, आयु में तो मुझ से बहुत छोटे हैं, लेकिन में जानकारी के बारें में छोटे,बड़े में भेदभाव नहीं करता, यह आवश्यक नहीं जिसका ज्ञान मुझे नहीं हैं,उसका ज्ञान मेरे से छोटे में ना हो,और उनके मार्गदर्शन के कारण,मेरे मन पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ रहा है,उन्होंने फ़ोन पर अपने गुरु जी से भी बात करवाई है,उनसे तो फ़ोन पर यदा,कदा बात होती है,और साधू का अर्थ में सज्जनता भी है, जब भी में उनको फोन करता हूँ,वोह मेरा फोन काट कर स्वयं फोन करते है, और जो छोटी,छोटी बातें जैसे,अचानक बिजली का चले जाना,नेट से संपर्क टूट जाना,जाम में फँस जाना,जिनपर में झल्ला जाता था, अब राजीव जी के मार्गदर्शन के कारण शांत और सयंत रहता हूँ |
इसके अतिरिक्त निर्भीकता भी आ गयी है, कुछ एक बार मुझे अपने विवादित लेखों पर,व्यंगात्मक टिप्पणियाँ और उन बातों पर जो मैंने स्वयं देखा है,और उस पर लिखा है,और मुझे टिप्पणियाँ ऐसे सदस्यों से मिली हैं,जिन्होंने मेरी बातों का पुष्टिकरण किये विना ,अपने व्यक्तित्व के अनुसार टिप्पणियाँ दीं हैं, एक दो मनोवेग्यानिक से संपर्क में रहने के कारण, उनके दी हुईं टिप्पणियों में उनका व्यक्तिव कुछ अंश तक में,पहचान सकता हूँ, पहले इस प्रकार की व्यंगात्मक टिप्पणियों के कारण मुझे दुःख होता था, परन्तु अब कोई असर नहीं होता है, यह भी राजीव जी के मार्गदर्शन के कारण ही है, और इसी माह की  7 तारीख को मेरा हर्निया का  ओपरेशन हैं, जीवन में कोई ओपरेशन नहीं हुआ है,परन्तु इस सबसे छोटे ओपरेशन के कारण मुझे भय लग रहा था, और अब वोह कम होता जा रहा है,यह भी राजीव जी के कारण,और जिन लोगों ने मेरे से सहानभूति जताई,उनका आभार प्रकट करता हूँ |
ओपरेशन के बाद जो लेख लिखने के लिए राजीव जी ने कहा है,वोह लिखूंगा,और इस को जय गुरु देव की कह कर समाप्त करता
 हूँ |
जय गुरु देव की 

मंगलवार, जुलाई 13

आज कल में श्री राजीव कुलश्रेष्ठ जी के लिखे हुए अध्यात्म के लेखों का अंग्रेजी में अनुवाद कर रहा हूँ |

हमारे देश में अध्यात्म भरा पड़ा है, श्री राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ जी ने मेरे इसी ब्लॉग पर मेरी एक पोस्ट पर मेरे से अपने लिखे हुए अध्यात्म के लेखों का हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद करने के लिए पूछा था,और में इस कार्य के लिए सहर्ष तैयार हो गया, वोह फेसबुक पर हैं,और मैंने फेसबुक पर उनकी अच्छी खासी अंग्रेजी देखी है संभवत यह साधू स्वाभाव ही है किसी को वोह कार्य देना जो की साधू कर सकतें हैं,साधू का शाब्दिक अर्थ ही सज्जन है  बहुत से अध्यात्म के शब्दों का में  अंग्रेजी में अनुवाद करने में सक्षम नहीं हूँ,परन्तु प्रयत्न तो कर ही सकता हूँ, और उन्होंने इसमें त्र्यम्बक जी और निनाद जी को इस ब्लॉग www.swpiritualismfromindia.blogspot.कॉम पर लिखने की अनुमति के लिए कहा था,जो मैंने दे दी है, त्र्यम्बक जी नुयोओर्क में  सॉफ्टवेर इंजिनियर हैं, और राजीव जी ने बताया था वोह भी अध्यात्म पर लिखतें हैं,में तो अध्यात्म के विशाल सागर में एक छोटी सी बूँद के समान हूँ, मेरी छोटी साली ने अमरीका से इमुनोलोजी में डॉक्टरएट करी है, और वोह जब अमरीका में पड़ रही थी,तो वोह भी अध्यात्म की बहुत सी सामग्री हमारे इस देश से ले जाती थी,में कोई प्रचार नहीं कर रहा हूँ,और ना ही किसी पर किसी प्रकार का दवाब हैं, आज कल बिजली की आंख मिचोली के कारण अभी तक राजीव जी की दो पोस्टों का ही अंग्रेजी में अनुवाद कर पाया हूँ, हाँ आप माने या ना माने बहुत बार मेरी अंग्रेजी की स्पेलिंग में गलती एक बार होती हैं,और जब पुन: में सोचता हूँ स्पेलिंग यह होनी चाहिये और में लिख देता हूँ तो सही पाता हूँ,फिर भी संभवत: कहीं ना कहीं स्पेलिंग में त्रुटी रह जाती होगी |
यह लिखते समय मुझे स्मरण हो रहा है, श्री रामकृष्ण परमहंस कोई विशेषपड़े लिखे नहीं थे,परन्तु उनको किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थीजो की  रामकृष्ण परमहंस को इस प्रकार के शिष्य विवेकाननद जी के रूप में मिले,जिनोहने विश्व में रामकृष्ण परमहंस जी की शिक्षा का प्रचार,प्रसार किया था |
इसी प्रकार अगर जिन्होंने ने परमहंस योगानंद द्वारा लिखी हुई पुस्तक योगी अमृत्कथा पड़ी हो तो उनको ज्ञात होगा की,विश्व में परमहंस योगानंद जी ने हमारे यहाँ के अध्यातम का विश्व में प्रचार किया था, योगानंद जी ने तो मानव जीवन के परतेक पहलुयों का बारे में प्रचार किया था |
अधिकतर लोग समझते हैं,की पश्चिमीं देशों में भोतिक्वाद हैं,और सच भी हैं,वहाँ भोतिक्वाद की अधिकता है,परन्तु ऐसे लोग भी हैं,जो भारत के अध्यात्म के बारें में समझना और अपनाना भी चाहते हैं, इस्कोन मंदिर तो इस बात के जीवंत उदहारण हैं, हाँ बहुधा पश्चमी लोग यहाँ आकर के सही मार्गदर्शन के अभाव में भटक भी जातें हैं,जैसे कि सन 1970 के दशक में,हिप्पियों का युग आया था,नशे,सेक्स को ही यहाँ का अध्यात्म समझने लगे, तरह,तरह की नशे करते थे,तरह,तरह की नशे की गोलियां लेते थे,और इन्ही भोग विलास को अध्यात्म समझते थे|
 बस मेरा कहना येही हैं,अगर कोई विदेशी भाई,बहिन जो आप लोगों के संपर्क में हो ,हमारे देश का अध्यात्म समझना या अपनाना चाहे तो,राजीव जी के लिखे हुए लेखों का मेरे द्वारा किया हुआ अंग्रेजी अनुवाद पड़ सकता है |
सभी धर्म चाहे,सिख,हिन्दू,मुस्लिम,बोध,जैन,इत्यादि अच्छी,अच्छी बात ही सिखाते हैं,उनका आदान,प्रदान भी किया जा सकता है |

बस इस लेख को भारतीय हिन्दू अध्यात्म के अनुसार जय,जय श्री गुरुदेव जैसे वाक्य से समाप्त करता हूँ |
क्योंकि यह हिन्दू अध्यात्म पर आधारित है,इसलिए जय गुरुदेव जैसे वाक्य से समापन कर रहा हूँ, वाकी सब धर्मो के लिए मेरे
माँ में सम्मान है |
जय गुरुदेव की

रविवार, जून 27

कठिन समय में पड़ोसियों ने भी साथ दिया |

 कहा जाता है, जो " मित्र कठिन समय में काम आता है,वोही सच्चा मित्र है", यह बात हमारे पड़ोसियों ने भी चरितार्थ करी , मेरी पत्नी की दोनों आँखों में मोतियाबिंद हो गया था, और मेरी पत्नी गाजियाबाद के एक स्कूल में पढाती है, उसके आँखों के मोतियाबंद का पता उस स्कूल की सालाना  गर्मियों की छुट्टी होने से कुछ ही दिन पहले पता चला था, डाक्टर साहब को दिखाया था,तो डाक्टर साहब बोले इसका, "ओपरेशन करना पड़ेगा", यह पूछने पर कि कब ओपरेशन करवाएं, वोह आँखों का निरिक्षण तो कर ही चुके थे, बायीं आंख में कम मोतिया था और दायीं आंख में अधिक, वोह बोले,अभी मोतिया अधिक नहीं बड़ा आप की जब इच्छा हो तब करवा लें, स्कूल का काम काज तो बायीं आंख के साहरे चल रहा था,और स्कूल की सालाना गर्मियों की छुट्टियों में एक माह बचा था  |
मेने मेरा समस्त वाली अलका जी से इसके लिए देसी इलाज पूछा था,तो उन्होंने मेरे ब्लॉग की पोस्ट "यह मेरी शतकीय पोस्ट है",उस पर उन्होंने देसी इलाज बता दिया था जिसमे ओपरेशन की आवश्यकता भी नहीं पड़ती, परन्तु उन्होंने लिखा था,तीन महीने में आँखों में उतरा मोतिया समाप्त हो जायेगा, एक तो समय स्कूल की गर्मियों की सालाना छुट्टियों के बाद स्कूल खुलने में एक महिना रह गया था, और दूसरा कि बहुत से लोग देसी इलाज के लिए कम ही सोचते हैं,और देसी इलाज इस प्रकार के रोग में करवाना नहीं चाहते हैं, मेरी पत्नी इस का  में अपवाद नहीं है, जबकि मेरे किसी रोग की चिकत्सा के बारे में अलका जी ने मुझे बताया था,और उस चिकत्सा से मुझे लाभ हुआ था, इसलिए स्कूल की गर्मियों की छुट्टी के समय मोतिया के ओपरेशन के बारे में निर्णय लिया गया,बायीं आंख का पहले और उसके तीन चार दिन के बाद दायीं आंख का |
 हमारी काम वाली की लड़की की शादी तय हो चुकी थी,जिसके बारे में मेने इसी ब्लॉग स्नेह परिवार में लिखा भी है, इसलिए उसने अपनी लड़की की शादी के कारण एक माह की छुट्टी ले ली थी,और विकल्प में अपने स्थान पर किसी और कामवाली  को लगा गयी थी, ऑपेरशन भी इसी माह में होना था, विकल्प में लगी काम वाली काम करने का काम करने वाली को दोनों समय का खाना बनाना भी था, जो कि पहली काम वाली करती थी, हम दोनों के जीवन की व्यस्तता तो रहती है,और में व्यस्त ना भी रहूँ मुझे भोजन बनाना नहीं आता है,बस चाय,कोफ़ी,सेंडविच बनाना और डबल रोटी के स्लाइस सेकना आता है, बाकि|कुछ नहीं आता |
 खैर स्कूल की गर्मियों की छुट्टियों में 24 मई को पत्नी की वायीं आंख के ओपरेशन का निर्णय हुआ था,हमारी बेटी का जन्मदिन 23 मई को होता है,इसलिए बेटी के जन्मदिन के एक दिन बाद वायीं आंख के ओपरेशन का निर्णय हुआ था,हमारे बेटी दामाद और उसके दोनों छोटे बच्चे आ चुके थे, 24 मई को मेरी पत्नी की बायीं आंख का ओपरेशन हुआ, अब डाक्टर साहब ने आंख का ख्याल रखने के लिए कुछ निर्देश दिए थे, जैसे मूह नहीं धोना, खाना नहीं बनाना क्योंकि खाना बनाते समय धुआं आंख को हानि पंहुचा सकती है,ओपरेशन के समय में,हमारे दामाद और बेटी ओपरेशन थियटर के बहार ही बैठे हुए थे, और ओपरेशन के बाद मेरी पत्नी की आंख के ऊपर लगी हुई पट्टी एक दिन बाद खुलनी थी, और एक दिन बाद मतलब कि 25 मई को मेरी पत्नी की आंख की पट्टी खुली,और वोह ख़ुशी से चीख पड़ी,कितना अच्छा दिखाई दे रहा है,और उसके अगले दिन यानि कि 26 मई को उसको बायीं आंख से कुछ नहीं दिखाई दे रहा था,और वोह रोने लगी,डाक्टर को दिखाने गए तो उन्होंने अच्छी तरह से बायीं को आंख को चेक किया और बोले कोई घबराने की बात नहीं है,केवल सूजन आ गयी है,इसलिए दिखाई नहीं दे रहा है,और उस दिन हमारी बेटी ने दिन और रात का खाना बनाया था,और वोह जो विकल्प में लगी हुई कामवाली थी उसने देख लिया हमारी बेटी को खाना बनाते हुए देख लिया,अभी तक तो वोह विकल्प में लगी हुई कामवाली, घर का सारे काम के साथ खाना भी बना रही थी,और वोह काम छोड़ कर चली गयी |
समस्या यहाँ से प्रारम्भ होती है,बाकि तो सारा काम हो सकता था,परन्तु खाना बनाना मुझे तो आता नहीं,और बेटी भी कितने दिन रहती वोह भी एक सप्ताह रह कर चली गयी, अपने घर के सामने रहने वाली पड़ोसन को बताया तो उसने बताया जहाँ वोह दूध लेने जाती है," उसके सामने वाले लडको को खाने  डिब्बा आता  है" , और उसने हमें प्रयत्न करके उस डिब्बे वाले का कार्ड ला कर दिया,हमने उस डिब्बे वाले से संपर्क किया तो खाने की समस्या तो समाप्त हो गयी थी, लेकिन उस डिब्बे वाले के घर में विवाह होने के कारण,हम को पहले ही  सूचित कर दिया गया था,5 दिन खाना नहीं आयगा,वोह वोही भोजन की समस्या मूह बाएं खड़ी थी, रोज,रोज बाजार से खाना लाना तो बहुत महंगा पड़ रहा था,तो एक और हमारी पड़ोसिन जिसका बीयूटी पार्लर भी है,उसने 5 दिन हम दोनों को सुबह का नाश्ता,दिन का तथा रात का भोजन तो कराया ही, और उसके साथ क्योंकि डाक्टर साहब ने यह भी कह रखा था,"अगर मेरी पत्नी सिर के बाल धोय, तो पीछे करके",तो उसने जब,जब मेरी पत्नी को आवश्यकता पड़ी तो उस बीयूटी पार्लर वाली ने मेरी पत्नी के सिर के बाल भी धोय,एक दिन तो दोनों हमारी पड़ोसिने रात का खाना बना लायीं |
अभी बायीं आंख को ओपरेशन हो चुका था,दायीं आंख का ओपरेशन होना बाकि था,बायीं आंख के हादसे के बाद मेरी पत्नी ने किसी पंडित से पूछा तो उसने कुछ बताया,जो मैंने कर दिया था,बायीं आंख ठीक हो चुकी थी,आंख का मामला था,में भी थोड़ा डरा हुआ था,और मेने डाक्टर साहब से पूछा,कि कभी,कभी मोतिया के ओपरेशन के समय आंख में लगाया हुआ लेंस अन्दर चला जाता है,डाक्टर साहब जो कि फेलो ऑफ़ रेटिना सोसाइटी से हैं,उन्होंने उस बारे में डरोईंग बना कर     मुझे अच्छी तरह से समझा दिया था,और इन दिनों गत्यात्मक ज्योतिष वाली संगीता जी दिल्ली आयीं हुई थी,अविनाश जी से मेने उनका संपर्क नंबर लिया  उनके बारे में तो पूछा नहीं,जो कि मुझे बाद में अशीशीटता लगी, और अपनी पत्नी के बारे में पूछने लगा,और वोह वोली गृह इत्यादि सब ठीक है,ओपरेशन करा लीजिये,और 1 जून को उसकी दायीं आंख का सफल ओपरेशन हो गया, अब तो
डिब्बे का भोजन आ रहा था, नहीं तो मुझे विश्वास है,उस समय भी पडोसी साथ देते |
पड़ोसियों ने साथ दिया 

सोमवार, जून 14

किसी की बात सुन कर उसको भावनात्मक सुख दिया जा सकता है |

सुख प्राय: तीन प्रकार के होतें है, शारीरिक,मानसिक और आत्मिक और भावनातमक, भावनात्मक सुख  ही आत्मिक सुख है, प्राय: लोग किसी के शारीरिक कष्ट में व्यक्ति विशेष का साथ देते हैं,और उसकी सहायता करते हैं, और इस प्रकार से उस व्यक्ति विशेष को शारीरिक सुख अधिक, और उससे कम मानसिक सुख मिलता है, और उसी व्यक्ति के लिए जैसे आज कल प्रचलन है, अगर कोई बीमार है,उसके लिए फूलों का गुलदस्ता या फल इत्यादी लेकर जाते हैं, तो उसको मानसिक सुख के साथ आत्मिक सुख भी मिलता है,यही है भावनातमक सुख | अब अगर किसी में कुछ देने की सामर्थ नहीं हैं,और वोह उस व्यक्ति विशेष के पास केवल उस व्यक्ति विशेष के पास हाल चाल पूछने ही चला जाता है,तो उसने भी तो असमर्थ होते हुए भी तो भावनात्मक सुख ही तो दिया |
मनुष्य की कोई भी,आयु,लिंग,व्यवसाय या परिवेश हो सामाजिक प्राणी होने के कारण उसको आत्मिक या भावनात्मक सुख की आपेक्षा तो होती ही है |
मनोवेग्यानिक या मनोचिक्त्सक किसी अवसाद बाले या मानसिक संतुलन खो देने वाले की मनोयोग से वोह बातें सुनते हैं,जो किसी और के लिए निरर्थक होंती हैं, जिन बातों के बारे में कोई कह सकता है,क्या "बेकार की बात है", या "बोर मत करो" या "हमें नहीं सुननी बेकार की बातें", या "तुम्हारी बातें तार्किक नहीं हैं" इत्यादि, जब इंसान वाल्यावस्था में होता है, वोह "अपने माँ बाप से जिज्ञासा वश बहुत प्रकार के प्रश्न पूछता है,और उसकी जिज्ञासा को उसके माँ बाप उसको उत्तर दे कर उसकी जिज्ञासा को शांत करते हैं, और उसके बाद जब उसका समपर्क बहारी दुनिया से होता है,तो उसके गुरु जन उसके मित्र उसके प्रश्नों के उत्तर दे कर उसकी जिज्ञासा को शांत करते हैं, और वोह कुछ अपने अनुभवों से भी सीखता है, अगर उसको उचित उत्तर मिल जाता है,तो उसको भावनात्मक तृप्ति हो जाती है, और इसके विपरीत उसकी बातों पर व्यंग किया जाता है,या उसको तृसकृत किया जाता है,या उससे किनारा किया जाता है,तो उसको भावनात्मक सुख नहीं मिलता  है,और वोह जाता है,मनोचिक्त्सक या मनोवेग्यानिक की शरण में, चाहयें उसके परिवार वाले उसके शुभ चिन्तक या वोह स्वयं जाये, उसके चेतन मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है,जो उसके अवचेतन में चला जाता है, इसका निदान चाहें   मनोचिक्त्सक उसकी रोग जान कर औषधियों से चिकत्सा करे या मनोवेग्यानिक  वेहवियर थरेपी से,बात करके मंवोज्ञानिक या मनोचिक्त्सक दोनों ही उसको बात करके उसकी बात को समझ कर उसको भावनात्मक सुख और भावनात्मक सुरक्षा ही तो  देतें हैं, और बात को सुनना भी एक कला है, किसी की बात पूरी होने से पहले बीच में ही टोकना तो भावनात्मक कष्ट देना ही तो है,मन्वेज्ञानिक या मनोचिक्त्सक किसी की बात पूरी होने से पहले नहीं टोकतें हैं,मनोयोग से बात पूरी सुनने के बाद ही प्रश्न पूछते हैं, और सुनने की कला में यह भी आता है,जो व्यक्ति जिस बात को जिस प्रकार कहना चाहता है,या बताना चाहता है,बिलकुल उसी प्रकार मनोवेग्यानिक या मनोचिक्त्सक समझते हैं |
किसी व्यक्ति विशेष की बात या उसके व्यवहार पर पर अगर व्यंग किया जाता है,वोह उस व्यक्ति को भावनात्मक कष्ट ही तो पहुँचता  है, किसी व्यवस्था पर या किसी के सामाजिक दृष्टि से अनुचित  कृत्य पर अगर व्यंग किया जाये तो तो उचित है, पर व्यक्ति पर अनुचित व्यंग करना तो उसको भावनात्मक कष्ट ही तो  पहुंचाएगा |
बहुत बार किसी बुडे व्यक्ति को घर की छत देखते हुए या आसमान देखते हुए देखा जा सकता है,कारण यही है उनका समय तो व्यतीत हो गया है,और उनके उस समय की बात सुनने के लिए बदले हुए समय में बात करने को नहीं मिलता,अगर कोई उनकी बात सुने तो उस बुडे व्यक्ति को भावनात्मक सुख मिलता है, यह बात अलग है अगर उस बुडे व्यक्ति को उसी की आयु के समीप के लोग मिल जाएँ तो उसको भावनात्मक सुख मिलेगा,क्योंकि उनकी रुचि और बातें कमोवेश एक सी ही होंगी |
आज कल के समय के अनुसार सयुंक्त परिवार टूटते जा रहे हैं, परन्तु सयुंक्त परिवार की यही तो विशेषता थी की छोटे, बड़े सब मिल जुल के रहते थे,और एक दूसरे को समझते थे,भावनात्मक सुख एक दूसरे को मिल जाता था,आज कल के एकाकी जीवन की तरह नहीं था |
अगर आमने सामने बात हो रही है,तो सुनने वाले और सुनाने वाले के हाव भाव एक दूसरे पर प्रभाव डालते ही हैं, अगर सुनने वाले के हाव भाव ऐसे हैं,जिससे सुनाने वाले को ऐसा लगे कि सुनने वाला उसकी बातों को समझने का प्रयत्न कर रहा है,तो सुनने वाले को भावनात्मक सुख मिलता है,नहीं तो विपरीत प्रभाव पड़ता है |
जो कलाकार होतें है,बेहद संवेंदन शील होते हैं,चाहें चित्रकार हों,कवी हों,किसी के पास कैसी भी कला हो,वोह अपने भावों को कला में प्रदर्शित करतें हैं,और उनको समझने वाला उस कला को उसी प्रकार से समझे तो यही कलाकार का पुरुस्कार होता है,जो उनको आत्मसंतुष्टि दे करके उनको भावनात्मक सुख देता है |
किसी की बात सुन कर उसको भावनात्मक सुख दिया जा सकता है |

शुक्रवार, जून 4

किसी का अन्तकरण भी बदला जा सकता है |

इस लेख का प्रारम्भ तुलसीदास जी के रामायण ग्रन्थ की इन पंक्तियों से आरंभ कर रहा हूँ, " उपदेश कुशल बहुतेरे", किसी के अन्तकरण पर अगर प्रभाव डालना है,तो केवल उपदेश देने से कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है, इस सन्दर्भ में मुझे किसी के द्वारा रचित एक कहानी याद आ रही है |
इस  सन्दर्भ में एक किसी के द्वारा लिखी हुई एक कहानी मेरे  मानस पटल पर उभर रही है,एक कलाकार ने एक चित्र बनाया और रात्रि में एक स्थान पर टांग दिया,जहाँ से आते जाते राहगीरों की दृष्टि सहज ही उस स्थान पर पड़े जहाँ पर चित्र टंगा हुआ था,और उस कलाकार ने उस  चित्र के नीचे लिख दिया, "जिस किसी को इस चित्र में जिस स्थान पर त्रुटी दिखाई दे,उस स्थान पर निशान लगा दे",अगले दिन सुबह जब उस चित्रकार ने अपने बनाये हुए चित्र को देखा तो,उसको चित्र तो किसी भी कोण से दृष्टिगोचर नहीं हुआ,बस विभिन्न प्रकार के निशान ही उसको चित्र के स्थान  दिखाई दिए |
 उस चित्रकार ने पुन: हुबहू वोही चित्र बनाया और रात्रि में पुन: वोह चित्र उसी स्थान पर टांग दिया,और इस बार उसने अपने बनाये हुए चित्र के नीचे बदला हुआ वाक्य लिख दिया, " जिस किसी को भी इस चित्र में, जिस स्थान पर त्रुटी  दृष्टिगोचर हो वहां ठीक कर दे", रात्रि के बाद पुन:प्रात:काल में जब उस चित्रकार ने उस चित्र को देखा,तो उसको चित्र बिना किसी संशोधन के वैसा ही मिला जैसा उसने बनाया था |
 यह कहानी तुलसीदास जी के द्वारा रामायण में लिखी हुई, उन पंक्तियों को चरितार्थ करती है," उपदेश कुशल बहुतेरे" |
कहने का तात्पर्य है,अगर किसी का अन्तकरण बदलना है,तो केवल उपदेश से काम नहीं बनता, सब इंसानों चाहे स्त्री हो पुरुष,बालक हो या बालिका या युवक हो या युवती सब का सोचने का तरीका पृथक,पृथक होता है, किसी के द्वारा कही हुई बात को कौन किस प्रकार से लेता है,उसकी कोई निशचिता नहीं होती, कौन कही हुई बात को उस प्रकार आत्मसात करता है,जैसे कही हुई बात कहने वाले के मानसपटल पर उभरी है उसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, और कोई कहने वाले के मानसपटल पर उभरी हुई बात को,उसी प्रकार नहीं ग्रहण करता है,जिस प्रकार किसी ने कही है,तो विवाद उत्पन्न  हो सकता  है,वैमनस्य भी पैदा हो सकती है,झगड़ा हो सकता है,कहने वाला और सुनने वाला दोनों ही आवेशित भी  हो सकते हैं,आपस में बैर उत्पन्न हो सकता है, अनायास ही सम्बन्ध ख़राब हो सकते हैं, और अगर सुनने वाला उसी प्रकार से कही हुई बात को ग्रहण करता है,तो ऊपर लिखे हुए उदहारणो  के विपरीत भी हो सकता है,सदभावना उत्पन्न हो सकती है, आपसी प्रेम बड़ सकता है,रिश्ते प्रगाड़ हो सकते है,अमिट अच्छे सम्बन्ध बन सकते है,कहने वाले का सुनने वाले पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ेगा कुछ कहा नहीं जा सकता | 
किसी का व्यक्तित्व देश,काल,परिवेश और लालन,पालन और घटनाओ से बनता है,जब मानव का जन्म होता है, तो वोह कुम्हार की मिटटी की प्रकार का होता है, और कुम्हार उस मिटटी से भिन्न,भिन्न प्रकार के वर्तन निर्मित करता है,उसी प्रकार जब किसी बालक अथवा बालिका का जन्म होता है,या कोई किसी बालक या बालिका को गोद लेता है,उस समय बालक या बालिका इसी प्रकार कुम्हार की कच्ची मिटटी के समान होते हैं,और उस बच्चे या बच्ची का उसके माँ,बाप उसके व्यक्तिव का निर्माण  प्रारम्भ करते हैं, जन्म लेने के बाद तो बच्चे अपनी स्वाभिक क्रियाये जैसे सब से पहले अपनी गर्दन उठाना फिर बैठना उसके पश्चात बोलना,घुटनों के बल चलना फिर लडखड़ाते हुए कदम रखना और फिर चलना प्रारंभ करते हैं, बच्चा जब बोलना आरम्भ करता है,तो जिस देश,समाज में पैदा होता है,उसी के अनुरूप भाषा बोलता है, और उसके बाद प्रारंभ होता है,उस बच्चे या बच्ची के व्यक्तिव का निर्माण जैसा उसके माँ बाप उसके व्यक्तित्व को कुम्हार की कच्ची मिटटी की भांति निर्मित करते हैं,अब उस पर |प्रभाव पड़ता है,उस बालक और बालिका के देश और समाज का प्रभाव और बच्चा उसी देश और समाज के अनुरूप ढल जाता है,और शने: शने: जब बच्चा और बड़ा होता है,तब उसके संगी साथी बनते है,और प्रभाव पड़ने लगता है,बच्चे के संगी साथी का और उसका व्यक्तिव में उसके संगी साथी की संगत का प्रभाव पड़ने लगता है,इसी लिए कहा जाता है,"संगत का प्रभाव तो पड़ता ही है "| 

गुरुवार, अप्रैल 15

एक फिसिओथरेपी के डाक्टर ने प्रभाबित किया |

व्यस्तता के कारण ना तो कोई पोस्ट लिख पाया और ना ही पड़ पाया,एक तो दैनिक कार्य और पत्नी की फिस्योथरेपी के कारण उसको फिसियोथरेपी के लिए ले जाना,  और उसके फिसियोथेरपी  के व्यायाम कराना, के कारण समय का  अभाव सा बन गया था,अक्सर मेरे मस्तिष्क में हमारे समाज के करणाधारों के बारे में विचार आते हैं,जैसे शिक्षक जो हमें ऊँगली पकड़ कर हिंदी की वर्णमाला और अंग्रेजी की वर्णमाला का ज्ञान कराते हैं, जिस कारण हम लोग लिख और पड़ पाते हैं,और उतरोतर जैसे,जैसे हमारी बुद्धि का विकास होता है, यही शिक्षक लोग और हमें शिक्षा का ज्ञान देते हैं |
ऐसे ही दूसरा जो विचार आता है,चिकत्सक जो हम लोगों को अवस्वस्थ अवस्था से स्वस्थ अवस्था में लाते हैं,और निरोगी रहने में सहायता करते हैं, चाहे यह आय्रुवेदिक, होमियोपेथी या एलोपेथिक चिकत्सक हों,इसी क्रम में मेरे मस्तिष्क में मेरा सम्मत वाली अलका जी का विचार आ रहा है,जो अपनी आयुर्वेदिक चिकत्सा के बारे में लिख कर अप्र्ताय्क्ष और बीमारों का दूरभाष और घर पर आये मरीजो की चिकत्सा प्रत्यक्ष रूप से करती हैं, मेरी पत्नी की एक तो दोनों आँखों में मोतियाबिंद हो गया है, और अलका जी ने मेरे ब्लॉग की पोस्ट यह मेरी शतकीय पोस्ट है,उस पर टिप्पणी दे कर एक बहुत ही सरल आयुर्वेदिक चिकत्सा बताई है, जिससे और भी लोग लाभान्वित हो सकते हैं, बस विडम्बना यह है संभवत: बहुत ही कम लोग मेरी पोस्ट पड़ते हैं,जैसा मुझे नाम मात्र की मेरी पोस्ट पर आई टिप्पणियों से लगता है, कोई पड़े या नहीं पड़े बस में तो यह चाहता हूँ,कि लोगों को लाभ मिले इसीलिए मैंने यह वाक्य लिख दिया है, में कोई साहित्यकार तो नहीं हूँ,जो कि सहितीय के रूप में लिखूं, कभी कविता लिखा और बोला करता था, लेकिन वोह तो समय की गर्त में चला गया, ना ही  मेरे पास इतना अवकाश है,कि अलग,अलग विषयों पर लिखूं या  पडूं,बस जीवन के खट्टे,मीठे अनुभव हैं, जो कि मेरे लेखों में होते हैं |
 अब आता हूँ,मूल विषय पर मेरी पत्नी की दोनों टांगों में किसी भी टांग में असहनीय पीड़ा हो जाती थी, उसको हड्डियों के चिकत्सक को दिखाया, और उन चिकत्सक ने दवाइयां दी पर कोई प्रभाव ना पड़ा, और जब कुछ अच्छा या बुरा होना होता है,उसका क्रम बन जाता है, और हमारा अच्छा होने का सयोंग बन गया, उन चिकत्सक ने फिसियोथरेपी चिकत्सक जिनका नाम है, डाक्टर संदीप त्यागी का पता दिया, डाक्टर संदीप त्यागी थोड़े से पक्षाघात से ग्रसित हैं, और उनके क्लिनिक का नाम है माही फिसियोथरेपी और यह डाक्टर संदीप त्यागी पूर्णतया मरीजो से समर्पित हैं, में अपनी माता जी को किसी समय सपोंदयलितिस के इलाज के लिए दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में ले जाता था, वहाँ तो गर्दन में मशीन कुछ समय के लिए लगाई और हो गई छुट्टी और इसके अतिरिक्त कुछ नहीं, परन्तु यह माही क्लिनिक में डाक्टर संदीप त्यागी मशीनों से इलाज तो करते ही हैंअब, और उनको व्यायाम भी कराते हैं, जब में अपनी पत्नी को लेकर गया तो डाक्टर साहब ने हाथ से टांग पकड़ के ऊपर करते रहे और पूछने लगे,जिस स्थिति में अधिक पीड़ा हो तो बताना, उसमे तो श्रीमती जी को कोई अधिक पीड़ा नहीं हुई और फिर उन्होंने पत्नी की कमर पर अंगूठे से स्थान,स्थान पर दवाब डाला और पूछनेलगे जहा अधिक दर्द हो तो बताना और कमर के  एक स्थान पर अधिक पीड़ा हुई, और पत्नी की टांग में नहीं बल्कि मूल कारण कमर का निकला और डाक्टर साहब ने बताया यह शियातिका है, पहली बार मैंने फिसियोथरेपी के चिकत्सक को इस प्रकार रोग की जाँच करते देखा है, सब ही उनके क्लिनिक में आने वालों को इस प्रकार जाँच करते देखा है, हर किसी रोगी को वोह वयाम भी कराते हैं,चुटकुले इत्यादि सुना कर और विभिन्न प्रकार से अपने क्लिनिक का माहौल हल्का फुल्का बना के रखते हैं, इस लेख का लिखने का यही कारण है,किसी को फिसियो थरेपी की आवश्यकता हो तो वोह मुझ से संपर्क कर सकता है, मुझे उनका पता याद नहीं,परन्तु घर के समीप ही है,उनका पता लाने में मेरे को कोई परेशानी नहीं है |
  अब डाक्टर संदीप त्यागी मेरी पत्नी को एक दिन छोड़ के बुला रहे हैं, उन्होंने घर पर करने के लिए मेरी पत्नी को कुछ व्ययाम बता रखे हैं, और जब भी में अपनी पत्नी को लेकर उनके पास जाता हूँ, तो मुझ से पूछते हैं,क्या आपकी पत्नी घर पर व्ययाम कर रही हैं,ऐसा है उनका समर्पण भाव और कोई रोगी उनसे पूछता है,कि कितने दिनों में ठीक होंगे तो वोह कहते हैं,यह तो आप के ऊपर निर्भर हैं |
 उसी क्लिनिक में मेरी पत्नी की एक मित्र आतीं हैं,उनकी भुजा  में पीड़ा है, कुछ दिन बाद मैंने अपनी पत्नी की मित्र की भुजा में सूधार देखा, तो मैंने डाक्टर साहब से कहा इनकी भुजा में तो सूधार हैं,तो बोले यह तो यही बतायगीं ऐसा है मरीजो के प्रति इन डाक्टर साहब का समर्पण |

लेबल

अभी तो एक प्रश्न चिन्ह ही छोड़ा है ? (1) आत्मा अंश जीव अविनाशी (1) इन्ही त्योहारों के सामान सब मिल जुल कर रहें (1) इश्वर से इस वर्ष की प्रार्थना (1) इसके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ | (1) उस अविनाशी ईश्वर का स्वरुप है | (1) एक आशियाना जिन्दगी का (1) कब बदलोगे अपनी सोच समाज के लोगों ? (1) कहाँ गया विश्व बंधुत्व और सदभावना? (1) कहीं इस कन्या का विवाहित जीवन अंधकार मय ना हो | (1) किसी का अन्तकरण भी बदला जा सकता है (1) किसी की बात सुन कर उसको भावनात्मक सुख दिया जा सकता है | (1) कैसे होगा इस समस्या का समाधान? (1) चाहता हूँ इसके बाद वोह स्वस्थ रहे और ऑपेरशन की अवयाक्ष्ता ना पड़े | (1) जय गुरु देव की (1) जीत लो किसी का भी हिर्दय स्नेह और अपनेपन (1) डाक्टर साहब का समर्पण (1) पड़ोसियों ने साथ दिया (1) बच्चो में किसी प्रकार का फोविया ना होने दें (1) बस अंत मे यही कहूँगा परहित सम सुख नहीं | (1) बुरा ना मानो होली है | (1) मानवता को समर्पित एक लेख (1) मित्रों प्रेम कोई वासना नहीं है (1) में तो यही कहता हूँ (1) यह एक उपासना है । (1) राधे (2) राधे | (2) वाह प्रभु तेरी विचत्र लीला (1) वोह ना जाने कहाँ गयी (1) शमादान भी एक प्रकार का दान है | (1) सब का नववर्ष सब प्रकार की खुशियाँ देने वाला हो | (1) समांहुयिक प्रार्थना मैं बहुत बल है | (1)