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गुरुवार, अगस्त 5

सच्चे साधू संत का संसर्ग अवगुणों को गुणों मे परिवर्तित कर देता है |

मेरे को  इस ब्रह्माण्ड के लौकिक और अलौकिक रहस्यों की जिज्ञासा सदेव रही है, पड़ाई तो विज्ञान की की है, भौतिक शास्त्र, रासयन शास्त्र और कुछ सीमा तक जीव और वनस्पति विज्ञान, स्नातक का अध्यन किया टेकनोलिजिकल  इंस्टिट्यूट ऑफ़   टेक्सटाईल्स भिवानी से मतलब की वस्त्र तकनीक जिसमे थोड़ा यांत्रिक और विद्युतीय ज्ञान भी  दिया दिया  जाता है, मुख्य उद्दशेय तो वस्त्र तकनीक का होता है,और इसमें भी तीन भाग होतें हैं, कपड़ा बनाने की तकनीक पहला भाग,कपड़ा रंगने की तकनीक दूसरा भाग,और सिंथेटिक कपड़ा बनाने की तकनीक तीसरा भाग, जब मेंवस्त्र तकनीक का  सनातक हो गया,मुझे नौकरी मिली सिंथेटिक पोलीइस्टर का रेशा या ऐसे समझिये रुई बनाने के संसथान में, जिसमें रसायन विज्ञान का अधिक उपयोग होता है, बाकि ऊपर लिखी यांत्रिक और विद्युतीय  तकनीक तो काम में आतीं ही हैं,और क्रमश उन्नति होती गयी और प्रारंभिक पद से लेकर उच्चतम पद पर पहुँच गया था,और इस बीच में मेने कुछ संसथान भी बदले और पोलीइस्टर और नाईलोन का धागा बनाने के संस्थानों में काम किया  ,यहाँ पर एक रूचिकर बात बताता हूँ, न्यूयोर्क और लन्दन में एक साथ इस धागे का एक साथ अविष्कार होने के इस धागे का नाम नाईलोन पड़ा |
काम के कारण  मुझे नई,नई मशीनों के बारें में अध्यन करना पड़ा,और देश विदेश में मशीनों से  सम्बंधित कार्यों के कारण भ्रमण करना पड़ा, और सरकारी तथा गैर सरकारी कार्यप्रणाली को समझना पड़ा  क्योंकि यह संसथान चलाने के लिए आवशयक था, संभवत: इसी कारण जीवन के 56 बसंत देखने के बाद भी नई,नई जानकारी लेने की जिज्ञासा बनी रहती है,और इस 6 अगस्त को 57 वें बसंत का प्रारंभ हो जायेगा,और में भी उन लोगों की कतार में हूँ, जो मानते हैं आयु तो मात्र एक संख्या है, और इसी कारण मैंने अपने 50 वर्ष की आयु में,कम्पुटर सॉफ्टवेर सीखा |
यह तो सब रहा वैज्ञानिक ज्ञान के बारें में, अध्यातम के बारे में जानने की ललक तो प्रारम्भ से ही थी, इस कारण मैंने,    अनेकों धार्मिक,अध्यात्मिक पुस्तकों का अध्यन किया,बहुत से सिद्ध और साधारण मंदिरों,गुर्ददवारों,चर्चों में भी गया, बहुत से धर्मगुरु,पंडितो,संतो, सड़क के और दूसरे प्रकार के साधुओं तथा ,तांत्रिकों से मिला बस ओझाओं को छोड़ कर, इस कारण बहुत से कड़वे,मीठे अनुभव भी हुए, एक तांत्रिक मुझे ऐसा मिला,जो प्रारम्भ में तो मेरे मन को भा गया,परन्तु उतरोतर मुझे उसके असली रूप का क्रमश : पता चलता गया,उसको लोग गुरु जी कहते थे,और वोह हमारी कोलोनी के एक मंदिर में,हर रविवार को भैरो का दरबार लगाते थे, तथा मंगलवार को हनुमान जी का चोला चडाते थे, और उसके लिए उसको गुरु जी कहने वाले में समदर्शिता नहीं थी और में भी समदर्शिता नहीं वाले की श्रेणी में आता था , क्यों पड़ा उसके चक्कर में यह कभी बाद में लिखूंगा, और एक बार मैंने उनसे कुछ प्रश्न किया,और उसने मुझे ऐसा फटकारा की में तो चार दिन लगातार सो ही नहीं पाया, और विक्षिप्त अवस्था में पहुँच गया, इससे पहले माँ अम्बे का ध्यान किया करता था, किसी समय मैंने योगदा सत्संग सोसाइटी की सदयस्ता ली थी,इस कारण परमहंस योगानंद जी के जीवनउपयोगी  एक अध्याय हर माह आता था,और में उसके अनुसार जीवन का अनुसरण करता था, लेकिन उस फटकार के कारण में विक्षिप्त अवस्था में पहुँच गया था,ना माँ अम्बे का ध्यान,ना योगानंद जी अध्याओं के अनुसार जीवन का अनुसरण,ना नहाना ना वस्त्रों का ध्यान ऐसी अवस्था थी वोह  |
बहुत से मनोचिक्त्सक को दिखाया कोई विशेष लाभ नहीं मिला,और यह मुझे ज्ञात नहीं कैसे संभला और माँ अम्बे का ध्यान करने लगा और जैसे एक आम इन्सान को जीवन बिताना चाहिए वैसे विताने लगा |
रुचि तो अध्यातम और रहस्यों को जानने में सदा ही रही है,और नेट पर राजीव जी जो साधू जीवन व्यतीत कर रहें हैं,उनके आजकल में लेखों का,हिंदी से अंगेरजी अनुवाद कर रहा हूँ, उनके एक लेख काली चिड़िया का रहस्य पर मैंने एक टिप्पणी दी थी,और राजीव जी मेरी टिप्पणी का आशय समझ गये,और उसके वाद उन्होंने मेरे से उनके लेखों का अंगेरजी अनुवाद करने को कहा, और जो में www.spiritualismfromindia.blogspot.com में कर रहा हूँ, और उनसे मेरी जिज्ञासा शांत हो रही है, आयु में तो मुझ से बहुत छोटे हैं, लेकिन में जानकारी के बारें में छोटे,बड़े में भेदभाव नहीं करता, यह आवश्यक नहीं जिसका ज्ञान मुझे नहीं हैं,उसका ज्ञान मेरे से छोटे में ना हो,और उनके मार्गदर्शन के कारण,मेरे मन पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ रहा है,उन्होंने फ़ोन पर अपने गुरु जी से भी बात करवाई है,उनसे तो फ़ोन पर यदा,कदा बात होती है,और साधू का अर्थ में सज्जनता भी है, जब भी में उनको फोन करता हूँ,वोह मेरा फोन काट कर स्वयं फोन करते है, और जो छोटी,छोटी बातें जैसे,अचानक बिजली का चले जाना,नेट से संपर्क टूट जाना,जाम में फँस जाना,जिनपर में झल्ला जाता था, अब राजीव जी के मार्गदर्शन के कारण शांत और सयंत रहता हूँ |
इसके अतिरिक्त निर्भीकता भी आ गयी है, कुछ एक बार मुझे अपने विवादित लेखों पर,व्यंगात्मक टिप्पणियाँ और उन बातों पर जो मैंने स्वयं देखा है,और उस पर लिखा है,और मुझे टिप्पणियाँ ऐसे सदस्यों से मिली हैं,जिन्होंने मेरी बातों का पुष्टिकरण किये विना ,अपने व्यक्तित्व के अनुसार टिप्पणियाँ दीं हैं, एक दो मनोवेग्यानिक से संपर्क में रहने के कारण, उनके दी हुईं टिप्पणियों में उनका व्यक्तिव कुछ अंश तक में,पहचान सकता हूँ, पहले इस प्रकार की व्यंगात्मक टिप्पणियों के कारण मुझे दुःख होता था, परन्तु अब कोई असर नहीं होता है, यह भी राजीव जी के मार्गदर्शन के कारण ही है, और इसी माह की  7 तारीख को मेरा हर्निया का  ओपरेशन हैं, जीवन में कोई ओपरेशन नहीं हुआ है,परन्तु इस सबसे छोटे ओपरेशन के कारण मुझे भय लग रहा था, और अब वोह कम होता जा रहा है,यह भी राजीव जी के कारण,और जिन लोगों ने मेरे से सहानभूति जताई,उनका आभार प्रकट करता हूँ |
ओपरेशन के बाद जो लेख लिखने के लिए राजीव जी ने कहा है,वोह लिखूंगा,और इस को जय गुरु देव की कह कर समाप्त करता
 हूँ |
जय गुरु देव की 

6 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

सच्‍चे साधुओं की यही तो विशेषता होती है !!

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत सटीक...विचार ...आभार

नीरज गोस्वामी ने कहा…

विनय जी आपके ब्लॉग पर पहली बार आना हुआ...बहुत अच्छा लगा...आपके विचार बहुत स्पष्ट और प्रभावशाली हैं...मुझे असली साधू संतों से कोई समस्या नहीं है लेकिन उनकी गिनती बहुत कम है...ये जो धूनी रमाये डेरा बनाये हुए तथाकथिक साधू हैं वो दरअसल पाखंडी है और स्वार्थ साधना में लगे रहते हैं...इनसे मुझे चिढ है...इसीलिए मैं इन सबसे दूर रहता हूँ...मेरा मानना है के यदि आपका मन शांत है कोई लोभ नहीं है सबके प्रति दिल में प्रेम है तो फिर आपको किसी साधू के पास जाने की जरूरत नहीं है...हमारा खुद का स्वार्थ या कष्ट हमें ऐसे ढोंगियों के पास ले जाता है...ये लोग ऐसे परेशान दुखी लोगों का शोषण करते हैं...टी.वी पर रेशमी सिंहासन पर बिराजमान फूलों के राज सिंहासन पर बैठ कर मीठी मीठी बातें करने वाले ये लोग किसी काम के नहीं हैं...आपने ऐसे ही साधू की अच्छी व्याख्या की है...
आपको पढ़ कर बहुत आनंद मिला, आपके सीखने के गुण ने भी बहुत प्रभावित किया...मुझे भी कम्यूटर की सर्वप्रथम जानकारी सन दो हज़ार एक में हुई मैं आज साठ वर्ष की उम्र में भी मुझे कुछ नया सीखने को आतुर रहता हूँ...अपना ब्लॉग भी मैंने इसीलिए शुरू किया है...मैं ग़ज़लें शौक से लिखता हूँ और मेरे गुरु की उम्र मेरे बेटे से भी कम है...गुरु की उम्र नहीं ज्ञान देखा जाता है..
एक बार फिर इस पोस्ट के लिए आपको बधाई...
नीरज

राज भाटिय़ा ने कहा…

सत्य वचन जी

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) ने कहा…

बहुत सार्थक लगे आपके विचार..

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं

हैपी ब्लॉगिंग

सतीश सक्सेना ने कहा…

आप बढ़िया और दिल से लिखते हैं , शुभकामनायें !

लेबल

अभी तो एक प्रश्न चिन्ह ही छोड़ा है ? (1) आत्मा अंश जीव अविनाशी (1) इन्ही त्योहारों के सामान सब मिल जुल कर रहें (1) इश्वर से इस वर्ष की प्रार्थना (1) इसके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ | (1) उस अविनाशी ईश्वर का स्वरुप है | (1) एक आशियाना जिन्दगी का (1) कब बदलोगे अपनी सोच समाज के लोगों ? (1) कहाँ गया विश्व बंधुत्व और सदभावना? (1) कहीं इस कन्या का विवाहित जीवन अंधकार मय ना हो | (1) किसी का अन्तकरण भी बदला जा सकता है (1) किसी की बात सुन कर उसको भावनात्मक सुख दिया जा सकता है | (1) कैसे होगा इस समस्या का समाधान? (1) चाहता हूँ इसके बाद वोह स्वस्थ रहे और ऑपेरशन की अवयाक्ष्ता ना पड़े | (1) जय गुरु देव की (1) जीत लो किसी का भी हिर्दय स्नेह और अपनेपन (1) डाक्टर साहब का समर्पण (1) पड़ोसियों ने साथ दिया (1) बच्चो में किसी प्रकार का फोविया ना होने दें (1) बस अंत मे यही कहूँगा परहित सम सुख नहीं | (1) बुरा ना मानो होली है | (1) मानवता को समर्पित एक लेख (1) मित्रों प्रेम कोई वासना नहीं है (1) में तो यही कहता हूँ (1) यह एक उपासना है । (1) राधे (2) राधे | (2) वाह प्रभु तेरी विचत्र लीला (1) वोह ना जाने कहाँ गयी (1) शमादान भी एक प्रकार का दान है | (1) सब का नववर्ष सब प्रकार की खुशियाँ देने वाला हो | (1) समांहुयिक प्रार्थना मैं बहुत बल है | (1)