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मंगलवार, मार्च 15

आइये जापान को और विनाश से बचाने के लिए प्रार्थना करें

आइये जापान को और विनाश से बचाने के लिए प्रार्थना करें 

आदिम युग से उस परम पिता परमात्मा की सृष्टि के नियम बिना किसी बदलाव के आज तक चलते आ रहें हैं, और भविष्य मैं चलते रहेंगे, या यह भी कहा जा सकता है,जब तक यह सृष्टि रहेगी परमात्मा के नियम वोही रहेंगे,सूर्य देवता सदा पूरब से निकल कर पश्चिम मैं ही अस्त होंगे जैसे की होता आया है,चंद्रमा पश्चिम से निकल कर पूर्व मैं ही अस्त होता आया है,और होता ही रहेगा,दिन के बाद रात, ग्रीष्म,वर्षा और शीत काल का मोसम,सदा की तरह यह अटल नियम ही रहेंगे, उस कलाकार ने इसी रचना कर दी है, जो कि सदा और सर्वथा एक सी है |
 कोई भी वस्तु ऊपर से पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की सीमा मैं गिरेगी तो नीचे ही गिरेगी, जन्म मिरतु का यह क्रम भी लगातार चल रहा है, और धर्म ग्रन्थ गीता के अनुसार,आत्माएं शरीर रुपी चोला ही,बदलती है,और हमें पूर्वजन्म की स्मृति नहीं रहती है, और हमको बार,बार अपने मैं  सुधर लाने का अवसर दिया जाता है, यदि हमें पुर्ब्जन्म की समिर्ती रहती तो हम अपने मैं सुधार इसलिए नहीं लाते कि हमें अवसर तो मिलेगा ही,और हमारा जीवन कष्टों मैं बीता होता,तो हममें नया जीवन जीने का साहस नहीं होता, यह प्रभु का नियम चलता ही चला आ रहा है |

सर आइजेक न्यूटन ने तीन नियम बनाये  

1. जो भी वस्तु ऊपर से गिरेगी वो नीचे ही गिरेगी |

२. जो वस्तु  गतिमान है, वोह गतिमान ही रहेगी, और जो वस्तु स्थिर है,वोह स्थिर ही रहेगी |

३. हर क्रिया की पर्तिक्रिया होती है |

यह न्यूटन के तीनो नियम,ऐसे ही चलते रहे |

परन्तु जब आइन्सटीन का युग आया तो उन्होंने न्यूटन के  तीनो नियमो को संशोधित किया |

१. जो वस्तु गुरुत्वाआकर्षण की सीमा मैं है,वोह वस्तु ऊपर से नीचे ही गिरेगी |

२. जो वस्तु गतिमान है,वोह गति मैं ही रहेगी  और जो वस्तु स्थिर है,वोह स्थिर ही रहेगी,जब तक उस पर बल ना लगाया जाये |

३. हर क्रिया के विपरीत उसी के बराबर की प्रतिक्रिया होती है |

परमात्मा को कभी भी अपने बनाये हुए नियोमो को संशोधित करने की आवश्यकता नहीं पड़ी, परन्तु मानव को कभी विज्ञानं के नियोमों को संशोधित करना पड़ा,और कभी तो एक थ्योरी के विपरीत दूसरी थ्योरी देने की
आवश्यकता पड़ी|

परमात्मा के नियम तो सदा ही स्थिर थे,और बहुत सी बातों का ज्ञान इंसान को नहीं था,तभी तो अर्केमेदेज़ टब मैं स्नान करने गये,तो उनको अनुभव हुआ,द्रव किसी वस्तु के आयतन जो उसमे डाली जाती है,अपने उतने ही आयेतन  को विस्थापित करता है |
परमात्मा का यह नियम तो सदा ही चला आ रहा है |

वोह मालिक प्रोटोपलास्म मैं जान डाल कर विभिन्न प्रकार के जीव बनता है,कीड़े,जानवर और इंसान,जबकि प्रोटोपलास्म को अगर माईकरोस्कोप के नीचे देखो तो एक से ही लगते हैं,वेशक इन्सान ने जानवरों के क्लोन बनाने मैं सफलता प्राप्त कर ली,जो कि बिलकुल ही स्वंतत्र रूप से नहीं बना था, परमात्मा की तरह स्वंतत्र रूप से 
नहीं बना था,जैसे सांसारिक जीवों से कोई भिन्न  जीव |

और उस कलाकार की रचना तो देखो, स्त्री पुरुष के शरीर,और हार्मोन मैं,बदलाव करके,बल्कि प्रत्येक जीव मैं,नर मादा बना कर इसी रचना कर दी, जिससे उन्ही के स्वरुप के जीव उत्पन्न होते रहे हैं,होते रहेंगे,केवल एक अमीबा को छोड़ कर जो की एक सेल का बना होता है,और जब उसका दूसरा सेल बनता है,तो दूसरा अमीबा बन जाता है, पुरुष वर्ग मैं टेस्टटरोन की अधिकता और स्त्री वर्ग मैं ओस्ट्रोजन की अधिकता होने के कारण,एक दुसरे के स्वाभाव मैं अंतर है  जो उनकी संतानों के लिए आवश्यक है,ऐसी  सरंचना की है,उस प्रभु ने |

मानव वैज्ञानिको ने बहुधा किसी एक विषय पर मतभेद प्रकट किया है, परन्तु प्रभु के नियोमों मैं कोई मतभेद नहीं है |
आज दूरभाष,दूरदर्शन, रेडियो,मोबाइल जितने भी संचार माध्यम हैं,वोह वायुमंडल मैं ध्वनि,और प्रकाश की तरंगे छोड़ने और प्राप्त करने पर आधारित हैं, जो इन वस्तुओं के अविष्कार होने से ही पहले वायुमंडल मैं थीं,

वायुमंडल मैं कोई भी तरंग जाती है,चाहें वोह मानसिक विचारों की हों,ध्वनि की या प्रकाश की हों,वोह वायुमंडल मैं उपस्थित इथ र को प्रभावित करतीं हैं,और उसका प्रभाव विश्व और विश्व के जीवो को प्रभावित करता है,आइये हम सब मिल कर, जापान के लिए प्रार्थना करें,और और अधिक से अधिक लोग प्रार्थना करेंगे तो,जापान को और त्रासदी से बचाया जा सकता है |

"परम पिता परमात्मा,भगवान कृष्ण, जीसिसस,सभी धर्मो के संत महानुभाव, हम अपने हिर्दय मैं,अपने भाई,बहनों का दुःख अनुभव कर सकें और हम आपका दिव्य प्यार अनुभव करें और उन अपने भाई,बहिन जो आपकी ही संतान है,जैसे की हम आपकी संतान है,आपका प्यार हमारे हिर्दय मैं हो,और वोह हम अपने भाई,बहनों को बाँट के इस भयानक त्रासदी से बचा सकें |"

यह प्रार्थना समूह मैं एक साथ एक ही समय पर करें तो वायुमंडल मैं इथर प्रभावित होगा,और इस प्रार्थना का प्रभाव  अवश्य पड़ेगा |

स्नेह परिवार की ओर से प्रार्थना 

समांहुयिक प्रार्थना मैं बहुत बल है |
   

9 टिप्‍पणियां:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

जी हाँ आपकी बात से सहमत हूँ.... इस सामूहिक प्रार्थना में आपके साथ हैं..... वहां के लोगों के लिए हार्दिक संवेदनाएं.....

vinay ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
vinay ने कहा…

मोनिका जी,आपके बिना किसी के शर्त के जापान के लोगों के परमात्मा के दिव्य प्रेम जो कि बिना कोई शर्त के होता है,उसके लिये हार्दिक धन्यवाद,आप अपने पहचान के जितने लोग हैं,उनको यह सन्देश पहुंचायें,यह मेरी प्रार्थना है ।
धन्यवाद

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA ने कहा…

विनय जी आपके भाव बहुत अच्छे हैं । हम आपके साथ हैं ।

alka sarwat ने कहा…

सामूहिक प्रार्थना में सच में शक्ति है .ईश्वर जापानियों को ये त्रासदी सहने की शक्ति प्रदान करे.उनके आत्म बल को बनाए रखे.
आमीन

Sarojini Sahoo ने कहा…

I support your cause. Let us pray for Japan and for the mankind which is reaching ahead a disaster.
Sorry for writing in English.

vinay ने कहा…

dear friend sarojini language does not count for the wellbeing,thanks for the sport.

vinay ने कहा…

धन्यवाद राजीव जी

shama ने कहा…

Is pahal me ham aapke saath hain. Eeshwar kare aur Japan me ho raha vinash ruk jaye!

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अभी तो एक प्रश्न चिन्ह ही छोड़ा है ? (1) आत्मा अंश जीव अविनाशी (1) इन्ही त्योहारों के सामान सब मिल जुल कर रहें (1) इश्वर से इस वर्ष की प्रार्थना (1) इसके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ | (1) उस अविनाशी ईश्वर का स्वरुप है | (1) एक आशियाना जिन्दगी का (1) कब बदलोगे अपनी सोच समाज के लोगों ? (1) कहाँ गया विश्व बंधुत्व और सदभावना? (1) कहीं इस कन्या का विवाहित जीवन अंधकार मय ना हो | (1) किसी का अन्तकरण भी बदला जा सकता है (1) किसी की बात सुन कर उसको भावनात्मक सुख दिया जा सकता है | (1) कैसे होगा इस समस्या का समाधान? (1) चाहता हूँ इसके बाद वोह स्वस्थ रहे और ऑपेरशन की अवयाक्ष्ता ना पड़े | (1) जय गुरु देव की (1) जीत लो किसी का भी हिर्दय स्नेह और अपनेपन (1) डाक्टर साहब का समर्पण (1) पड़ोसियों ने साथ दिया (1) बच्चो में किसी प्रकार का फोविया ना होने दें (1) बस अंत मे यही कहूँगा परहित सम सुख नहीं | (1) बुरा ना मानो होली है | (1) मानवता को समर्पित एक लेख (1) मित्रों प्रेम कोई वासना नहीं है (1) में तो यही कहता हूँ (1) यह एक उपासना है । (1) राधे (2) राधे | (2) वाह प्रभु तेरी विचत्र लीला (1) वोह ना जाने कहाँ गयी (1) शमादान भी एक प्रकार का दान है | (1) सब का नववर्ष सब प्रकार की खुशियाँ देने वाला हो | (1) समांहुयिक प्रार्थना मैं बहुत बल है | (1)